किबा श्री शची भबन माझे
शची के घर में अनेक प्रकार की मंगल-ध्वनियाँ गूँज रही हैं। सब लोग भगवान् गौर के विवाह के कर्मों में व्यस्त हैं।
भगवान् गौर स्वयं भगवान् कृष्ण हैं, गोकुल के चन्द्र भगवान् कृष्ण। उनके विवाह का स्थान आनन्द से उमड़ पड़ा है।
साध्वी स्त्रियाँ तेल से उनके सुन्दर केशों की मालिश करती हैं। बार-बार उनके केश बिखर जाते हैं।
कोई उनके मुख और अंगों पर हल्दी का लेप लगाता है। उन्हें इस तरह हल्दी से रँगा देखकर सब मुस्कुराते हैं। हर साँस से वे उनकी पूजा करते हैं।
कोई उनके अंगों पर सुगन्धित द्रव्य लगाता है। क्या उनके अंग अपनी सहज सुगन्ध से पहले ही सुगन्धित नहीं हैं? उनकी तुलना किसी और से कैसे की जा सकती है?
गंगाजल से भगवान् गौर का अभिषेक किया गया। नरहरि हाथ ऊपर उठाता है। केवल कौतूहल का बहाना करके वह भगवान् गौर के रूप को निहारता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 6