लक्ष्मी प्राय लक्ष्मी ठाकुराणी
लक्ष्मीप्रिया, जो स्वयं देवी लक्ष्मी के समान हैं, दिन-रात अपनी सास की सेवा करती हैं।
अपने पति के प्रति उनकी भक्ति कभी डिगती नहीं। वे दिन-रात अपने पति की सेवा करती हैं।
प्रभु निमाई एक महान पण्डित हैं। वे पढ़ाते हैं। चारों दिशाओं में उनके अनगिनत विद्यार्थी हैं।
ऐसी शिक्षा कहीं कोई नहीं पा सकता था। ऐसा लगता है जैसे बृहस्पति स्वयं नदिया में पाठ पढ़ा रहे हों।
प्रभु विश्वम्भर गंगादास के विद्यार्थी हैं। प्रभु विश्वम्भर सब विद्याओं में निपुण हैं। वे विद्या के सागर हैं।
प्रभु निमाई ने अपने तर्कों को एक बड़े जाल की तरह बिछा दिया था। उनके तर्कों का उत्तर देने की सामर्थ्य किसी में नहीं थी।
अपने छात्रों को साथ लेकर वे भोर के समय गंगा के तट पर जाते और विद्या की लीलाएँ करते।
चारों दिशाओं में निमाई का यश फैला हुआ है। नरहरि अब आनन्द से अभिभूत हो गया है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 8