Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

मन रे, केनो मिछे भजिछो असार?

मन रे, केनो मिछे भजिछो असार? भूत-मोय ए सोंसार जीबेर पखेते छार अमङ्गल-समुद्र अपार
अर्थ

हे मन, तू क्यों निरर्थक वस्तु का व्यर्थ भजन करता है? जीव के लिए यह भूत-तत्वों से बना संसार राख के ढेर के समान तुच्छ है। यह अमंगल का असीम सागर है।

भूतातीत शुद्ध-जीब, निरञ्जन सदा-शिब मायातीत प्रेमेर आधार तब शुद्ध-सत्त ताइ, ए जोड-जगते भाइ केनो मुग्ध ह-ओ बार बार
अर्थ

शुद्ध जीव भूत-तत्त्वों से परे है, माया से परे है, सदा निरञ्जन और मंगलमय है, और प्रेम का आधार है। हे भाई! तुम्हारा असली स्वरूप शुद्ध और आध्यात्मिक है। फिर इस जड़ जगत में तुम बार-बार क्यों मोहित होते हो?

फिरे देखो एक-बार आत्म अमृतेर धार ता'ते बुद्धि उचित तोमार तुमि आत्म-रूपी हो'ये श्री-चैतन्य-समाश्रोये बृन्दाबने थाको अनिबार
अर्थ

एक बार फिर देख कि आत्मा अमृत की धारा से भरी है। यही तेरी उचित बुद्धि है। स्वयं को शुद्ध आत्मा जानकर श्री चैतन्य की शरण ले, और सदा वृन्दावन में निवास कर।

नित्य-काल सखी-सङ्गे, परानन्द-सेबा-रङ्गे जुगल-भजन कोरो' सार ए हेनो जुगल-धन छारे जेइ मूर्ख जन ता'र गति नाहि देखि आर
अर्थ

नित्यकाल सखियों के संग रहकर आनन्दपूर्वक युगल की सेवा कर, यही सार है। जो मूर्ख इस युगल-धन को त्याग देते हैं, उनकी क्या गति होगी, यह मुझे नहीं दिखता।

इस भजन के बारे में

पद
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