मन रे, केनो मिछे भजिछो असार?
हे मन, तू क्यों निरर्थक वस्तु का व्यर्थ भजन करता है? जीव के लिए यह भूत-तत्वों से बना संसार राख के ढेर के समान तुच्छ है। यह अमंगल का असीम सागर है।
शुद्ध जीव भूत-तत्त्वों से परे है, माया से परे है, सदा निरञ्जन और मंगलमय है, और प्रेम का आधार है। हे भाई! तुम्हारा असली स्वरूप शुद्ध और आध्यात्मिक है। फिर इस जड़ जगत में तुम बार-बार क्यों मोहित होते हो?
एक बार फिर देख कि आत्मा अमृत की धारा से भरी है। यही तेरी उचित बुद्धि है। स्वयं को शुद्ध आत्मा जानकर श्री चैतन्य की शरण ले, और सदा वृन्दावन में निवास कर।
नित्यकाल सखियों के संग रहकर आनन्दपूर्वक युगल की सेवा कर, यही सार है। जो मूर्ख इस युगल-धन को त्याग देते हैं, उनकी क्या गति होगी, यह मुझे नहीं दिखता।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- कल्याण-कल्पतरु
- भाव
- पद
- 4