मन तुमि भालबास कामेर तरङ्ग
हे मन! तू क्यों काम की लहरों से प्रेम करता है? भौतिक काम को त्यागकर शुद्ध कामना की सेवा कर, और अप्राकृत आनन्द को फैला।
यह अनित्य भौतिक काम तुझे कभी शांति नहीं देगा, कभी विश्राम नहीं देगा। इससे तेरी प्यास कभी नहीं बुझती। तू काम की वस्तुएँ चाहता है, फिर भी उन्हें नहीं पाता। और यदि पा भी ले, तो वे तेरा साथ छोड़कर चली जाती हैं।
तू जिसकी सेवा करता है, वह तेरा भजन नहीं कर सकता। उससे तो भक्तिविनोद के अंग दुःख की आग में जलते हैं। इसलिए इस झूठी कामना को छोड़ दे, और सच्ची कामना वाला बन। वृन्दावन के अनंग (कामदेव) का भजन कर। उनके फूलों के बाणों से तेरी नित्य देह में अंतरंग प्रेम भर जाएगा।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- कल्याण-कल्पतरु
- भाव
- पद
- 3