मन रे, तुमि बोरो सन्दिग्ध अन्तर
हे मन! तेरे भीतर बहुत संदेह भरा है। तू इस संसार में आया और जड़ जगत में बंध गया। अब तू सदा जड़ वस्तुओं में आसक्त रहता है।
अपने वास्तविक धाम को भूलकर तू भौतिक कामनाओं की सेवा करता है। तुझे जड़ पदार्थ के अतिरिक्त कुछ नहीं दिखता। तेरा वास्तविक स्वरूप ढका हुआ है, और देह के भीतर लुप्त-सा हो गया है।
तू सदा जड़ पदार्थ का ही चिंतन करता है, तेरे सारे कार्य भौतिक हैं। यह दुःख मैं किससे कहूँ? तूने अपने नित्य स्वामी को छोड़कर किसी तुच्छ वस्तु का आश्रय ले लिया है।
तू आत्मा के तत्व को नहीं देखता; तूने शुद्ध सत्ता को छोड़ दिया है। तुझे आत्मा में कोई रुचि नहीं। तू धीरे-धीरे इस संदेह को ही अधिक आदर देता जाता है कि आत्मा है भी, या नहीं।
इस प्रकार तू धीरे-धीरे जड़ के भ्रम में गिरता गया, और अपने वास्तविक स्वरूप से भिन्न हो गया। अब मेरी बात मान, आत्मा का चोर मत बन, अब से साधु-संगति कर।
वैष्णवों की कृपा के बल से तेरे सारे संदेह मिट जाएँगे, और तेरी आत्मा फिर तेरी हो जाएगी। तू वृन्दावन-धाम को प्राप्त करेगा, और नेत्रों में अश्रु तथा रोमांचित देह के साथ श्री श्री राधा-कृष्ण की सेवा करेगा।
राधा-कृष्ण के श्री चरण ही भक्तिविनोद का परम धन हैं। उस धन में मेरी प्रीति निरंतर बनी रहे।