मन तुमि बोरोइ चञ्चल
हे मन, तू बड़ा चंचल और उपद्रवी है। सरल और निष्कपट भक्तों से तेरा कोई स्नेह नहीं, परन्तु धूर्तों के प्रति तेरा गहरा आकर्षण है।
जो ढोंग करना जानता है, वही तेरे लिए साधु है, और उसकी संगति तुझे नचाती रहती है। देख, जिसका वेश क्रूर है, वही तेरी श्रद्धा का पात्र है, और तू भक्त बनकर उसके चरणों में गिरता है।
जिसे साधुओं की संगति मिलती है, उसे ही भक्ति का फल प्राप्त होता है। हे मन, निष्कपट और शान्त भाव धारण कर। चंचलता को त्यागकर श्रीकृष्ण के चरणों की भक्ति कर, और धूर्तों की संगति से सदा दूर रह।