मायेर अङ्गुलि धरि शिशु गौर हरि
अपनी माता की उँगली पकड़कर शिशु गौर-हरि एक-एक डग भरते हुए चले।
अपनी माता के हाथ को खींचते हुए वे क्षण भर चले, सावधानी से आधे-आधे डग भरते हुए। फिर वे ठोकर खाकर गिर पड़े।
माता शची ने उन्हें अपनी गोद में बिठा लिया और उनके शरीर की धूल झाड़ दी। फिर चलने का प्रयत्न करते हुए शिशु गौर-हरि फिर धरती पर गिर पड़े।
“अहा! अहा!” कहती हुई माता शची ने अपने वस्त्र के छोर से फिर उनके शरीर की धूल पोंछी। उन्हें गोद में लेकर उन्होंने उनके कमल-मुख को चूम लिया।
वासुदेव घोष कहते हैं: इस तरह शिशु गौर-हरि धूल में गिरे। प्रेम से भरकर वे पूछते हैं: गौर-हरि कितनी बार गिरे?
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- वासुदेव घोष · जीवनी पढ़ें
- राग
- बेलोयार राग, दशकोशी
- पद
- 5