पूर्णिमा रजनी चाँद गगने उदय
सन्ध्या के आकाश में पूर्णिमा का चन्द्रमा उदय होता है। चन्द्रमा को देखकर बालक गौरचन्द्र का हृदय हर्ष से भर जाता है।
“माँ, मुझे चाँद दे दो!” वे जोर-जोर से माँगते हैं। बाँहें उठाकर माता शची पुकारती हैं, “ओ चाँद, यहाँ आओ! यहाँ आओ!”
निष्ठुर चन्द्रमा नहीं आता। निमाई बहुत व्याकुल हो उठते हैं। वे रोते हैं और धूल में गिर पड़ते हैं। अपने ही हाथों से वे अपने सिर के बाल उखाड़ने का प्रयास करते हैं।
जगन्नाथ मिश्र के घर से शची राधा और कृष्ण का एक चित्र लाती हैं। शची अपने हाथ से पुत्र को सहलाकर उन्हें शान्त करती हैं।
चित्र को थामकर बालक गौरचन्द्र के हृदय में बड़ा आनन्द होता है। वासुदेव घोष कहते हैं: चित्र को निहारते हुए भगवान गौरचन्द्र को उसमें अपना ही मुख दिखाई देता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- वासुदेव घोष · जीवनी पढ़ें
- राग
- बेलोयार राग, दशकोशी
- पद
- 5