भाव के अनुसार वैष्णव भजन
गौड़ीय वैष्णव परम्परा में भजन विषय के अनुसार नहीं, बल्कि भाव के अनुसार बाँटे जाते हैं, यानी वह भक्ति-भावना जिसमें उन्हें गाया जाता है। पश्चाताप का भजन, लालसा का भजन और स्तुति का भजन, तीनों कृष्ण को ही सम्बोधित हो सकते हैं, फिर भी हर एक की भावना बिलकुल अलग होती है। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने शरणागति को दैन्य, आत्म-निवेदन और लालसा में बाँटा; कल्याण-कल्पतरु में पश्चाताप और प्रार्थना के खण्ड हैं; श्रील नरोत्तम दास ठाकुर की प्रार्थना में विरह और महिमा के भजन हैं। नीचे दिया हर भाव आचार्यों के इन्हीं विभाजनों से लिया गया है, हमारी ओर से तय नहीं किया गया।
नए हैं? कीर्तन के लिए हरिनाम की महिमा से, या निजी प्रार्थना के लिए समर्पण से शुरू करें।
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समर्पण और आत्म-निवेदन (शरणागति)
कृष्ण की पूरी शरण लेने और बिना कुछ बचाए स्वयं को उन्हें अर्पित करने के भजन।
22 भजनदीनता और पश्चाताप (दैन्य, अनुताप)
दीनता और सच्चे आत्म-धिक्कार के भजन, जिनमें भक्ति से दूर बीते जीवन पर शोक है।
39 भजनउत्कण्ठा और अभिलाषा (लालसा)
गहरी आध्यात्मिक उत्कण्ठा के भजन, जो बार-बार पूछते हैं: वह दिन कब आएगा?
54 भजनमहिमा और स्तुति (स्तुति, महिमा)
भगवान के नाम, रूप, गुण और लीलाओं की स्तुति करते आनन्द भरे भजन।
117 भजनप्रार्थना और निवेदन (विज्ञप्ति)
भगवान और उनके भक्तों से सीधे, हृदय से की गई विनती के भजन।
68 भजनउपदेश और मार्गदर्शन (उपदेश)
भक्ति-जीवन पर सीख देने वाले भजन, जो अक्सर अपने ही मन को सम्बोधित होते हैं।
71 भजनहरिनाम की महिमा (नाम-माहात्म्य)
पवित्र नाम की महिमा, शक्ति और मधुरता का गान करने वाले भजन।
27 भजनप्रश्न
वैष्णव भजनों में भाव क्या है?
भाव वह भक्ति-भावना या मनोदशा है जिसमें कोई भजन गाया जाता है। गौड़ीय वैष्णव भजन-ग्रन्थ परम्परा से विषय के बजाय भाव के अनुसार सजाए जाते हैं, इसलिए दीनता, लालसा, विरह और स्तुति के भजनों के अपने-अपने खण्ड होते हैं।
भगवान से विरह के वैष्णव भजन क्या कहलाते हैं?
भगवान से बिछड़ने की भावना में गाए गए भजन विप्रलम्भ या विरह के भजन कहलाते हैं। इनमें उनके न होने की पीड़ा से प्रेम और गहरा होता दिखता है।
दैन्य और लालसा में क्या अन्तर है?
दैन्य दीनता और पश्चाताप का भाव है, जिसमें भक्त अपनी पतित दशा पर शोक करता है। लालसा उत्कण्ठा और अभिलाषा का भाव है, जिसमें भक्त आगे की सेवा के लिए तरसता है, अक्सर इन शब्दों में: “वह दिन कब मेरा होगा?”
किस भजन का कौन-सा भाव है, यह किसने तय किया?
स्वयं आचार्यों ने। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर, श्रील नरोत्तम दास ठाकुर और अन्य आचार्यों ने अपने भजन-ग्रन्थों को इन्हीं खण्डों में बाँटा, इसलिए हर भजन का भाव उसी अध्याय से लिया गया है जिसमें उसके रचयिता ने उसे रखा।
मुझे किस भाव में गाना चाहिए?
हर भाव मंगलमय है। बहुत से भक्त शरणागति या हरिनाम की महिमा से शुरू करते हैं, निजी प्रार्थना में दैन्य और लालसा के भजन गाते हैं, और उत्सव के कीर्तन में स्तुति के भजन गाते हैं।