तुमि सर्वेश्वरेश्वर ब्रजेन्द्र कुमार
तुमि सर्वेश्वरेश्वर, ब्रजेन्द्र-कुमार!
कृष्ण की पूरी शरण लेने और बिना कुछ बचाए स्वयं को उन्हें अर्पित करने के भजन।
22 भजन
तुमि सर्वेश्वरेश्वर, ब्रजेन्द्र-कुमार!
राधा-कुन्ड-तट-कुञ्ज-कुटीर्
एखोन बुझिनु प्रभु! तोमार चरण
सर्वस्व तोमार्, चरणे संपिया,
तुमि तो’ मारिबे जारे, के तारे राखिते पारे,
निवेदन कोरि प्रभु! तोमार चरणे
कि जानि कि बले, तोमार धामेते,
केशव! तुवा जगत विचित्र
आत्म-निवेदन, तुवा पदे कोरि’,
`आमार’ बोलिते प्रभु! आरे किछु नाइ
ना कोरोलुँ करम, गेयान नाहि भेलो,
`अहं मम’-शब्द-अर्थे जाहा किछु होय्
आत्म-समर्पने गेला अभिमान्
आमि तो’ स्वानन्द-सुखद-बासी
गोद्रुम-धामे भजन-अनुकूले
छोडतो पुरुष-अभिमान्
तुवा-भक्ति-अनुकूल जे-जे कार्य होय्
तुवा-भक्ति-प्रतिकूल धर्म जा’ते रोय्
दारा-पुत्र-निज-देहो-कुटुम्ब-पालने
(प्रानेश्वर्!) कोहोबुँ कि सरम कि बात्
बस्तुतः सकलि तव, जीव केहो नोय्
विषय-विमूढ आर् मायावादी जन्