निमा इ चञ्चल खेपा किछु इ ना माने गो शुन एक दिबसेर कथा
कुछ लोग मानते हैं कि बालक निमाई कभी चंचल या बेपरवाह नहीं होते। अरे, एक दिन की यह कथा सुनो कि उन्होंने क्या किया। माता के आँचल का छोर पकड़े वे आँगन में घूम रहे थे। तब उन्होंने अपनी ही परछाईं देखी।
माता के आँचल का छोर छोड़कर वे अपनी परछाईं के साथ खेलने लगे। तभी उन्हें एक साँप मिला। तब वे उस भयंकर साँप की कुण्डली पर लेट गए। उसमें उन्हें कैसा सुख मिला? मैं नहीं जानता।
“हाय! हाय!” चिल्लाते हुए सब लोग वहाँ दौड़े आए। साँप भागने लगा, पर बालक निमाई ने उस साँप को फिर पकड़ लिया। सब रो पड़े। शची व्याकुल हो गईं। बड़े प्रयास से उन्होंने निमाई को पकड़कर अपनी गोद में खींच लिया।
एक और बार बालक निमाई ने आकाश में उड़ते हुए एक विशाल पक्षी की ओर संकेत किया। “वह पक्षी मुझे उठा ले जाना चाहता है!” निमाई ने बार-बार यही कहा। माता के गले से लिपटकर वे रोने लगे।
उनकी आँखों के आँसुओं से उनका काला काजल बह चला, मानो नीलमणियों की दो लड़ियाँ हों, या उनके चन्द्रमा के समान मुख पर धब्बे हों। उन्होंने अपनी आँखों से क्या देखा?
यहाँ कोई कह सकता है: “इन बातों से मैं भ्रम में नहीं पड़ता। फिर भी इन्हें सुनकर मेरे प्राण टूटने लगते हैं और मैं रो पड़ता हूँ। नरहरि के प्राण-स्वरूप बालक प्रभु निमाई इन लीलाओं का आनन्द लेते हुए शायद भ्रम में पड़ भी जाएँ, पर उनके भक्त नहीं पड़ते। बिना डगमगाए उनके हृदय बालक निमाई की सच्ची पहचान को जानते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 6