नीरद नयाने नब घन सिञ्चने पूरल मुकुल अबलम्ब
उनके वर्षा-मेघ जैसे नेत्रों से बहती आँसुओं की बाढ़ कलियों की माला जैसी है। उनका पसीना फूलों के मकरन्द की तरह बूँद-बूँद टपकता है। उनके आनन्द के लक्षण खिले हुए कदम्ब के फूल जैसे हैं।
मैंने नर्तकों के राजा भगवान गौरकिशोर को देखा। वे नए सोने के कल्पवृक्ष जैसे हैं, जो गंगा के तट पर प्रकाशमान हैं।
उनके तेज़ चलते चरण ऐसा कमल हैं, जो भक्त-भौंरों के गूँजते समूह को आनन्द से मतवाला कर देता है। उस कमल की सुगन्ध से खिंचे हुए उत्सुक देवता और असुर उस स्थान की ओर दौड़ते हैं। दिन-रात वे उस कमल के पास ही रहते हैं।
बिना रुके भगवान गौर दिव्य प्रेम का रत्न बाँटते हैं। वे सबकी इच्छाएँ पूरी करते हैं। सारे दीन-हीन पतित लोग उनके चरणों की शरण लेते हैं। केवल गोविन्द दास को ही बहुत दूर रहना पड़ता है। केवल वही भगवान गौर के संग से वंचित है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास
- पद
- 4