निरुपम हेम ज्योति जिनि बरण
उनका अनुपम वर्ण सोने की चमक को भी हरा देता है। उनके चरणों के तलवे लाल हैं। वे भक्तों के गीतों से आनन्दित होते हैं।
सब गुणों के रत्नों से सजे भगवान गौरचन्द्र नाचते हैं। चारों दिशाएँ “हरि! हरि!” की ध्वनि से भर गई हैं।
उनका सुन्दर मुख शरद ऋतु के चन्द्रमा को फटकारता है। दिन-रात उनकी आँखों से दिव्य प्रेम के आँसू बहते रहते हैं।
उनके शरीर के रोएँ खड़े हैं। वे दिव्य प्रेम के अमृत में तैरते हैं। वे शान्त नहीं रह पाते।
वे सब लोकों को आनन्द से भर देते हैं। पूरी पृथ्वी पर केवल गोविन्द दास ही उस आनन्द से ठगा गया।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास
- पद
- 5