सुरधुनी तीरे तीर माहा बिलस इ
गंगा के तट पर एक बालक अपने मित्रों के साथ खेल रहा है।
हाथों से ताली बजाते हुए और “हरि! हरि!” गाते हुए वे, जो नर्तकों में श्रेष्ठ हैं, नाचते हैं।
शची के पुत्र की जय हो! तीनों लोक उनके सामने झुककर प्रणाम करते हैं। वे पूर्ण और सम्पूर्ण परम प्रभु हैं, जो इस संसार में अवतरित हुए हैं। वे लोकों को आनन्द से भर देते हैं। वे जन्म-मृत्यु के चक्र के सारे भय को टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं। वे पवित्र नामों के संकीर्तन की लीलाओं में मग्न हैं।
वे चम्पक के फूल की तरह गौर वर्ण हैं। वे दिव्य प्रेम के आनन्द में काँपते हैं। जोर-जोर से गले लगाकर वे अपने मित्रों को ढँक लेते हैं। उनके शरीर के रोएँ खड़े हैं। उनके कमल-नयनों से दिव्य प्रेम के आँसू बहते हैं।
“वाह! वाह!” कहती हैं बड़ी उम्र की स्त्रियाँ। बालक गौर परम बुद्धिमान हैं, बुद्धिमानों के शिरोमणि हैं। वे जीवित सब प्राणियों के जीवन हैं। हाय! गोविन्द दास उनके प्रेम के अमृत का स्वाद चखने से ठगा गया। इस क्षण भी गोविन्द दास में इतनी सामर्थ्य नहीं कि वह भगवान गौर की लीलाओं का वर्णन करने वाले इन शब्दों के मधुर अमृत को अपने कानों से पी सके।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास
- पद
- 5