पतित पाबन पर्भुर चरण
जो भगवान गौर के चरणों की शरण लेते हैं, जो चरण पतित जीवों को पवित्र करने वाले हैं, वे इस संसार में रहते हुए भी भगवान की आनन्दमय लीलाओं को दिव्य जगत् में देख पाते हैं।
सुनो, सुनो, सुनो, हे मेरे भाइयो। अब रहस्य का आवरण टूट गया है। जब भगवान गौर के मुख का चन्द्रमा उदित होता है, तब हृदय से घना अँधेरा भाग जाता है।
उनका रूप सुन्दर है। उनकी मुस्कान और चितवन मधुर हैं। उनकी भौंहें बाँकी हैं। उनके होंठ लाल हैं। वे मीठे अमृत की बाढ़ हैं।
उनके चरण सुन्दर हैं। उनके पैरों के नाखून चन्द्रमाओं जैसे हैं, तारों के समूह के बीच चमकते हुए चन्द्रमा। वे आनन्दित और शोभायमान होकर अनेक लीलाएँ करते हैं। यह बात गोविन्द दास जानता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास
- पद
- 4