प्रेमे ढल ढल गोरा कलेबर
प्रेम के आँसू भगवान गौर के शरीर पर बह रहे हैं। वे नृत्य के रस से विभोर हैं। भाव में विवश होकर वे प्रिय गदाधर को गले लगा लेते हैं।
करुणामय भगवान गौर इस संसार में अवतरित हुए हैं। केवल उनके गुणों का कीर्तन करने से ही सभी पतित और अभागे जीवों का उद्धार हो गया है।
बाहें उठाकर वे “हरि! हरि!” पुकारते हैं। उनके शरीर के रोएँ खड़े हो जाते हैं। उनकी आँखों से आँसू बहते हैं, जो पृथ्वी को भर देते हैं, स्वर्गीय गंगा की धारा जैसे आँसू।
दिव्य प्रेम के उस गुप्त धन को उन्होंने जगत् के लोगों को खुले हाथों बाँट दिया। उन्होंने सबकी आशा पूरी कर दी। उन्होंने दिव्य प्रेम का विशाल सागर बाँट दिया। फिर भी उन्होंने गोविन्द दास को उसकी एक बूँद भी नहीं दी। गोविन्द दास को उन्होंने भुला दिया।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास
- पद
- 4