पित बरण कलि पाबन गोरा
कलियुग को पावन करने वाले, गौरवर्ण गौरांग प्रेमविभोर होकर यों गाते हैं:
'चित्त के दर्पण को स्वच्छ करने वाले श्रीकृष्ण-कीर्तन की जय हो!'
'संसार के दावानल को बुझाने वाले और सारे क्लेश मिटाने वाले श्रीकृष्ण-कीर्तन की जय हो!'
'सौभाग्य के कुमुद को खिलाने वाली चन्द्रिका के समान श्रीकृष्ण-कीर्तन की जय हो, जो भक्ति के विलास को भी लाता है!'
'शुद्ध ज्ञान की वधू का जीवन-स्वरूप, सिद्ध-स्वरूप श्रीकृष्ण-कीर्तन की जय हो!'
'आनन्द-सागर को बढ़ाने वाले, बाढ़ की तरह उमड़ने वाले श्रीकृष्ण-कीर्तन की जय हो!'
'पग-पग पर अमृत का स्वाद देने वाले, प्रेम को प्रदान करने वाले श्रीकृष्ण-कीर्तन की जय हो!'
'भक्तिविनोद की अपनी आत्मा को स्नान कराने वाले, प्रेम के आधार श्रीकृष्ण-कीर्तन की जय हो!'