प्राणेश्वरि! एइ बार करुणा कर मोरे
हे प्राणेश्वरी! इस बार मुझ पर कृपा करो। दाँतों में तिनका पकड़कर, सिर पर हाथ जोड़कर, यह जन तुमसे विनती करता है।
प्रिय सखियों के संग मैं आनन्द से तुम्हारी सेवा करूँगा, और बड़े चाव से तुम्हारे अंगों का श्रृंगार करूँगा। अपनी प्रिय सखियों के बीच मुझे अपने चरण-कमलों की इस सेवा में रख लो।
मैं तुम्हें सुगन्धित चन्दन और रत्नों के आभूषणों से सजाऊँगा, और तरह-तरह के रेशमी वस्त्र पहनाऊँगा। इस प्रकार सेवा करते हुए मैं तुम्हारी दासी बनकर सदा तुम्हारे संग रहूँ।
मैं रत्नों की झारी में सुगन्धित जल भरकर लाऊँगा, और कपूर से महकते पान-सुपारी भी। यह सब एक थाल में सजाकर, साथ में लौंग, मालती की माला और तरह-तरह के अनुपम व्यंजन लाऊँगा।
कब सखियों का संकेत होगा, और मैं यह सब लाकर ललिता के पास रखूँगा? नरोत्तम दास कहते हैं: मेरी यही कामना है कि मैं सखियों के पीछे खड़ा रहूँ।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरोत्तम दास ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- प्रार्थना
- भाव
- पद
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