पुलके बलित अति ललित हेम तनु
उनके सुन्दर स्वर्णमय शरीर के रोएँ खड़े हैं। पल-पल वे दिव्य प्रेम से विभोर होते हैं। वे दिव्य प्रेम के कितने ही भावों का अनुभव करते हैं? उनकी आँखों से आँसुओं के रूप में दिव्य प्रेम के सागर बह रहे हैं।
उन परम प्रभु की जय हो, जय हो, जो यहाँ अवतरित होकर सारे संसार का मंगल करते हैं। वे कलियुग रूपी उन्मत्त हाथी को रोक देते हैं। वे लोकों को भगवान हरि के पवित्र नामों की ध्वनि से भर देते हैं।
जो व्यक्ति वास्तव में उनका अपना ही स्वरूप है, उसके प्रति प्रेम के अमृत में वे सराबोर हैं। एक क्षण वे हँसते हैं। अगले ही क्षण रोते हैं। भाव से विह्वल होकर वे रुँधे गले से टूटे-फूटे शब्द बोलते हैं। प्रेम के आनन्द में विभोर होकर उन्हें यह भान नहीं रहता कि वे स्वयं कौन हैं और दूसरे कौन हैं। (करुणा से विभोर होकर) वे पतित जीवों को गले लगाते हैं।
वे देवताओं और असुरों को दिव्य प्रेम के अमृत में सराबोर कर देते हैं। उन्हें पता नहीं रहता कि दिन है या रात। उस अमृत की एक बूँद का स्वाद चखकर गोविन्द दास रोता है। अब वह निश्चित रूप से जानता है कि भगवान गौर स्वयं श्री कृष्ण हैं, वही श्री कृष्ण जो लक्ष्मीदेवी के प्रियतम हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास
- पद
- 4