रधिक क्र्स्न रधिक तव विरहे केसव
AI-निर्मित अनुवाद — समीक्षा लंबित
राधा, हे कृष्ण! राधा! हे केशव, तुमसे बिछड़कर विरह में राधा की यह दशा है।
उसका शरीर क्षीण हो चुका है, इसलिए वह अपने वक्ष पर रखे सुंदर हार को भी भार के समान मानती है।
अपने शरीर पर लगे कोमल, गीले चंदन के लेप को भी वह भय से मानो विष समझकर देखती है।
उसकी साँसें, जो स्वभाव से शीतल और अनुपम हैं, अब उसे कामदेव की अग्नि के समान निरंतर जलाती-सी प्रतीत होती हैं।
वह चारों दिशाओं में आँसुओं की बूँदें बिखेरती है, उसके कमल-नयन मानो टूटी डंडी वाले कमल के समान हो गए हैं।
वह संध्याकाल के चंचल बालचंद्र के समान अपने गाल को हथेली से टिकाए हुए है, उसे हटाती ही नहीं।
कोमल पत्तों की सेज भी जब उसकी दृष्टि में आती है, तो वह उसे मानो प्रज्वलित अग्नि में बदली हुई देखती है।
"हरि, हरि" वह निरंतर अपने ही कान में जपती रहती है, मानो विरह-जनित मृत्यु को अपनी इच्छा से ही ले आ रही हो।
श्री जयदेव द्वारा रचित यह गीत श्रोता को केशव के चरणों तक ले जाकर सुख प्रदान करे।