रस परिपाटी नट कीर्तन लम्पट
प्रेम-रस के अमृत का स्वाद चखकर मदमस्त हुए वे कीर्तन में उन्मत्त होकर नाचते हैं। कितने ही आनन्दित भक्त उनके साथ लीलाएँ करते हैं? उनके नेत्रों की कोरों से निकली चंचल चितवन से प्रेरित होकर लाखों-लाखों लक्ष्मी-देवियाँ खेल-खेल में अपनी आँखों के कोनों से उनकी ओर देखती हैं।
वृन्दावन की अमृतमयी महिमा सुनकर उनका हृदय उन्मत्त हो उठता है। अपनी दोनों बाँहें उठाकर वे “हरि!” बोलते हैं। वे उन्मत्त होकर नाचते हैं। वे नर्तकों के राजा हैं। वे पृथ्वी पर आँसुओं की कितनी उमड़ती नदियाँ बहा देते हैं? उनकी दोनों आँखें दो घड़ों के समान हो गई हैं, जिनसे प्रेम के आँसू उँडेले जा रहे हैं।
वे पुरुष और प्रकृति के स्वामी हैं। वे कामदेव से भी अधिक मनोहर हैं। वे शोभामयी सुन्दरता के सबसे ऊँचे शिखर पर स्थित हैं। भगवान गौर दिव्य प्रेम के अमृत के सागर हैं। वे अत्यन्त गम्भीर और अत्यन्त बुद्धिमान हैं। उन्हें देखकर कोई बुद्धिमान स्त्री अपनी शान्त धीरता बनाए नहीं रख पाती।
वे तीनों लोकों में सबसे सुन्दर व्यक्ति हैं। उनके कन्धे चौड़े हैं। उनकी भुजाएँ सुन्दर और लम्बी हैं। उनके शरीर पर कुंकुम, चन्दन और कस्तूरी का लेप लगा है। उनके चरणों के तलवों का आश्रय लेकर वासु यह गीत गाते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- वासुदेव घोष · जीवनी पढ़ें
- पद
- 4