रति प्रेम स्नेह मान प्रणय ओ रागाख्यान
माधुर्य रस के स्थायी भाव की सात अवस्थाएँ हैं: प्रेम, स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग और भाव। रति जितनी गहरी होती जाती है, उतना ही क्रम से वह इन सात नामों को पाती है। यह स्थायी भाव सदा निर्मल रहता है।
स्नेह से आरम्भ होने वाले ये छह भाव सामान्य लोगों के बीच 'प्रेम' नाम से ही जाने जाते हैं। भक्त जिस भाव से कृष्ण से प्रेम करता है, कृष्ण भी उसी भाव से उस भक्त से प्रेम करते हैं। रस का यह रहस्य नित्य है।
भक्त के हृदय के सिंहासन पर बैठा हुआ स्थायी भाव सब भावों का राजा है। ह्लादिनी नाम की जो परा शक्ति है, उसका सार शुद्ध भक्ति है, और वही इस भाव के रूप में विराजती है।
स्थायी भाव विभाव आदि सभी भावों को अपने वश में लाकर रस को प्रकट करता है। यह रस नित्य आनन्दमय तत्त्व है, नित्य-सिद्ध है, सबसे उत्तम है, और जीव के हृदय में खिलता है।