रूपानुग तत्त्व सार बुझिते अकङ्ख जाँर
जो रूपानुग तत्त्व के सार को समझना चाहता है, उसे रस का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। वह चिन्मय आनन्द-रस ही समस्त तत्त्वों को अपने वश में रखता है, वही परम तत्त्व का अखण्ड और सर्वोच्च धन है।
वेदों का मर्म न समझकर ज्ञानीजन निर्विशेष ब्रह्म को खोजते रहते हैं, जो उसी रस की आभा मात्र है। उसी रस की छाया मात्र की चाह में योगीजन योग करते हैं, और उसी के छल में फँसकर कर्मीजन कर्म करते हैं।
विभाव, अनुभाव, सात्त्विक-भाव और संचारी-भाव, ये चार जब स्थायी-भाव में मिलते हैं, तब यह मिलन अत्यन्त सुन्दर बन जाता है। उस स्थायी-भाव में ही नित्य, चिदानन्दमय और सर्वोच्च आस्वाद्य रस विद्यमान रहता है।
भौतिक जगत में जो रस पाया जाता है और जड़ कविता में जिसका वर्णन होता है, वह उस परम रस का मिथ्या प्रतिबिम्ब मात्र है। वह न तो नित्य है, न सत्य, वह तो दर्पण के प्रतिबिम्ब या मरुस्थल के मृगजल के समान है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
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