Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

रूपानुग तत्त्व सार बुझिते अकङ्ख जाँर

रूपानुग तत्त्व-सार बुझिते अकङ्ख जाँर रस-ज्ञान ताँर प्रयोजन चिन्मोय आनन्द-रस सर्ब-तत्त्व जाँर बश अखण्ड परम तत्त्व-धन
अर्थ

जो रूपानुग तत्त्व के सार को समझना चाहता है, उसे रस का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। वह चिन्मय आनन्द-रस ही समस्त तत्त्वों को अपने वश में रखता है, वही परम तत्त्व का अखण्ड और सर्वोच्च धन है।

जाँर भाणे ज्ञानि जन ब्रह्मालोय-अन्वेषण कोरे नाहि बुझि' बेद-मर्म जाँर छाया-मात्र बोरे जोगी-जन जोग कोरे जार छले कर्मि कोरे कर्म
अर्थ

वेदों का मर्म न समझकर ज्ञानीजन निर्विशेष ब्रह्म को खोजते रहते हैं, जो उसी रस की आभा मात्र है। उसी रस की छाया मात्र की चाह में योगीजन योग करते हैं, और उसी के छल में फँसकर कर्मीजन कर्म करते हैं।

बिभाब अनुभाब आर सात्त्विक सञ्चारी चार स्थायी भाबे मिलन शुन्दर स्थायी भाबे रस होय नित्य चिद्-आनन्द-मोय परम आस्वाद्य निरन्तर
अर्थ

विभाव, अनुभाव, सात्त्विक-भाव और संचारी-भाव, ये चार जब स्थायी-भाव में मिलते हैं, तब यह मिलन अत्यन्त सुन्दर बन जाता है। उस स्थायी-भाव में ही नित्य, चिदानन्दमय और सर्वोच्च आस्वाद्य रस विद्यमान रहता है।

जे रस प्रपञ्च-गत जोड-काब्ये प्रोकाशित परम रसेर असन्-मूर्ति असन्-मूर्ति नित्य होय आदर्शेर छाया होय जेन मरीचिका जल-स्फूर्ति
अर्थ

भौतिक जगत में जो रस पाया जाता है और जड़ कविता में जिसका वर्णन होता है, वह उस परम रस का मिथ्या प्रतिबिम्ब मात्र है। वह न तो नित्य है, न सत्य, वह तो दर्पण के प्रतिबिम्ब या मरुस्थल के मृगजल के समान है।

इस भजन के बारे में

ग्रन्थ
गीतमाला
पद
4