शचि सुत गौर हरि नबद्वीपे अबतारि
नवद्वीप में इस संसार में अवतरित होकर भगवान गौरहरि शची के पुत्र बने और उन्होंने अनेक लीलाएँ कीं। अपने प्रिय पार्षदों के साथ संकीर्तन करके उन्होंने सबको आनन्द से भर दिया।
संन्यासी का वेश धारण करके प्रभु ने स्थान-स्थान पर भ्रमण किया। फिर वे सदा के लिए नीलाचल में ही रहे। श्रीमती राधारानी के प्रेम में उन्मत्त होकर उन्हें दिन और रात का पता नहीं रहता था। उन्होंने सारे जगत् को उसी तरह के दिव्य प्रेम से उन्मत्त कर दिया।
भगवान गौरहरि की अद्भुत लीलाएँ देखकर न भगवान नित्यानन्द-बलराम, न अप्राकृत गुणों के धाम अद्वैत आचार्य, न गदाधर, न श्रीवास, और न कोई और शान्त रह सका। सब के सब निरन्तर दिव्य प्रेम से विह्वल रहे।
भगवान गौरहरि अपने साथ दुर्लभ और बहुमूल्य रत्न सावधानी से लाए, ऐसे रत्न जिन्हें देवता भी नहीं पा सकते। प्रभु ने कृपा करके वे रत्न सबको बाँट दिए। और इस तरह उन्होंने कलियुग को गौरवशाली और भाग्यशाली समय बना दिया। नरहरि दास भगवान कृष्ण चैतन्य की महिमा इसी तरह गाते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 4