- पद 1अर्थहरे! हरे! गोविन्द! हरे! हे कालिय के संहारक! हे कंस के हन्ता! हे देवकी के आनंद! हे राम! हे हरि!
“गोविन्द” के परिणाम
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- पद 4अर्थ. . . लाल-लाल चरण, जिनकी महिमा सुंदर स्तुतियों में गाई गई है, कमल जैसे चरण, ऐसे कमल जिन्होंने गोविन्द दास को उनका मधु चखने के लिए लालायित भ्रमर बना दिया है।
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- पद 2अर्थजय जय गोविन्द के मनोहर रूप की, जिसकी सुन्दर आभा करोड़ों चन्द्रमाओं को भी परास्त करती है।
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- पद 2अर्थहे गोविन्द, केशव, जनार्दन, वासुदेव! हे विश्वेश्वर, विश्वरूप, मधुसूदन! हे श्री पद्मनाभ, पुरुषोत्तम, मुझे अपनी सेवा प्रदान कीजिए! हे नारायण, अच्युत, नृसिंह, आपको बारम्बार नमस्कार है!
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- पद 1अर्थश्री कृष्ण, परम आनंद-स्वरूप, गोविन्द, नन्द के पुत्र, तमाल वृक्ष के समान श्याम और कान्तिमान, मयूर-पंख का मुकुट धारण करने वाले;
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- पद 1अर्थवासुदेव के पुत्र, देवकी के पुत्र, गोपराज नन्द के लाडले कृष्ण को बार-बार प्रणाम; आनन्द देने वाले गोविन्द को नमस्कार।
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- पद 4अर्थमाखन-चोर, दही चुराने में निपुण; यमलार्जुन वृक्षों को तोड़ने वाले; गोविन्द, गोपाल।
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- पद 8अर्थ…भी दैदीप्यमान क्यों न हों; व्रज के श्रेष्ठ वन के शुभ आकाश में विचरण करते हुए, वे सदैव गोविन्द-चंद्रमा के साथ रहती हैं और उन्हीं के साथ देदीप्यमान होती हैं।…
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- पद 1अर्थहे गोवर्धन! आप मोरों के झुंडों से घिरे हैं, जो गोविन्द के मुख को सजाने वाली बाँसुरी की उठती ध्वनि पर नाचने की उत्कंठा से मतवाले हैं। आपकी ढलानें राधाकुंड की ऊँची तरंगों से भीगी रहती हैं। आप मेरी आशा पूर्ण करें!
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- पद 3अर्थगोविन्द, परम आनन्द, नन्द के घर का मंगल; यशोदा के स्नेह की खान से निकला माणिक्य; गोपराज रूपी सागर से उदित चन्द्रमा।
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- पद 5अर्थहे श्री राधिके, तुम्हारे चरण-कमल अपनी शरण में आए भक्तों पर चारों ओर शुद्ध प्रेम-सागर के मकरन्द-रस की धाराएँ निरन्तर बरसाते रहते हैं। गोविन्द के प्राणों के धन उन चरण-कमलों को मैं कब अपने सिर पर धारण करूँगा?
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- पद 9अर्थचन्द्रमा शीतल किरणें बिखेरता है, कल्पवृक्ष सद्गुणों से भरे हैं, और वृक्ष और लताएँ हर ऋतु में अपनी छाया देते हैं। आनन्दमय गोविन्द पास ही स्त्रियों के समूह के साथ अत्यन्त सुन्दर, मधुर विहार करते हैं।