- पद 8भजनअमल-कनक-पट्टोद्घृष्ट-काश्मीर-गौरीं
मधुरिम-लहरीभिः सम्परीतां किशोरीम्
हरि-भुज-परिरब्धां लब्ध-रोमाञ्च-पालिं
स्फुरद्-अरुण-दुकूलां राधिकाम् अर्चयामि
“गौर आरती” के परिणाम
439 भजन · 566 पद भजन के शब्दों में · 472 पद अर्थ में
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- पद 10भजनरतिम्- गौरी-लीले अपि तपति सौन्दर्य-किरणैः
शची-लक्ष्मी-सत्याः परिभवति सौभाग्य-बलनैः
वशी-कारैस्" चन्द्रावली-मुख-नवीन-व्रज-सतीः
क्षिपत्य् आराद् या तम्- हरि-दयित-राधाम्- भज मनः
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- पद 2भजनपद्मावती-सुतः श्रीमान् शची-नन्दन-पूर्वजः
भावोन्मत्तो जगत्-त्राता रक्त-गौर-कलेवरः
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- पद 1भजन(जय) श्री-कृष्ण-चैतन्य प्रभु नित्यानन्द
श्री-अद्वैत गदाधर श्रीवासादि-गौर-भक्त-वृन्द
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- पद 2भजनहे कृष्ण गोकुलचन्द्र हे गोपी प्राण-वल्लभ
हे कृष्ण-प्रिया –शिरोमणि
हेम-गौरी श्याम-गाय श्रवणे परश पाय
गुण शुनि जुडाय पराणी
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- पद 1अर्थउनका गौर शरीर तपे हुए सोने के समान चमकता है। उनका नृत्य भँवर की बड़ी लहरों के समान है। उनकी सुडौल बाहें गजराज की सूँड़ को भी पराजित कर देती हैं। विधाता ने उन्हें बड़े आनंद से गढ़ा है।
- पद 2अर्थगौरांग का सुंदर रूप संसार के हर हृदय को मोहित कर लेता है। अपनी ही शक्ति से उन्होंने स्रष्टा ब्रह्मा को उत्पन्न किया। सती स्त्रियों को वे आध्यात्मिक आनंद से चकित कर देते हैं।
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- पद 1अर्थसद्गुणों के मणि गौर प्रभु नृत्य करते हैं। वे प्रेम के मणियों से भरी हुई एक खान हैं। उनके चारों ओर उनके प्रिय पार्षद हैं। उनकी शोभा अद्भुत है। वे मानो तारों से घिरे हुए एक सुवर्ण चन्द्रमा हैं।
- पद 4अर्थखोल और करताल बज उठते हैं। गौर प्रभु चलते हुए भी सुन्दर ढंग से नृत्य करते हैं। उन्हें देखकर कौन मोहित न होगा? अब सभी आनन्द से उन्मत्त हैं। अब किसी के मन में दुःख और शोक नहीं रहता। परन्तु हाय! नरहरि किसी कारण से उस आनन्द से वंचित रह गए।
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- पद 2अर्थएक क्षण वे श्याम वर्ण के होते हैं, दूसरे क्षण गौर वर्ण के, तीसरे क्षण पीत वर्ण के। एक क्षण वे हंसते हैं, दूसरे क्षण रोते हैं, तीसरे क्षण मूर्च्छित हो जाते हैं।
- पद 3अर्थफिर वे 'गौर' का नाम भी नहीं ले पाते, केवल 'गों गों' करते हुए विलाप करते हैं। गौर-प्रेम से रंगे उनके अरुण नेत्रों से बहते आंसुओं में वे स्वयं तैरते रहते हैं।
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- पद 1अर्थउसे देखते ही चन्द्रमा-से श्याम ने गौरी को अपनी बाँहों में थाम लिया और उसका मुख पोंछने लगे। वे धीरे-धीरे अपने वस्त्र से उस पर हवा करते हैं।
- पद 4अर्थकुंज की कुटिया में पत्तों की मनोहर सेज है, भ्रमर मानो सुनते हुए गुनगुना रहा है; गौरी और श्याम दोनों एक-दूसरे की लीला में आनन्दित होते हैं, ऐसा गोविन्द दास कहते हैं।
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- पद 1अर्थहे प्रेम के ठाकुर गौरसुंदर! हे मेरे स्वामी! मैं आपसे अपनी पीड़ा और दुःख की क्या कथा कहूँ? मैं अपना स्वरूप भूल गया हूँ।
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- पद 5अर्थउनकी हुंकार से गौर प्रभु इस पृथ्वी पर आए। वैष्णव दास उनकी आराधना करते हैं।
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- पद 2भजनतुमि कृष्ण नीलमणि नब-मेघ-प्रभा जिनि'
ब्रजानन्द कोरो बितरण
तुमि राधे नब-गौरी गोरोचना-गर्ब होरि'
ब्रजे होरो कृष्णचन्द्र-मन
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- पद 7भजनगौर-चरित अमृत-धारा
कोरिते कोरिते पान
भक्तिबिनोद श्रीबासे मागे
जाय जेन मोर प्राण