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“हरे कृष्ण” के परिणाम

558 भजन · 980 पद भजन के शब्दों में · 802 पद अर्थ में

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1 पद अर्थ में 10

नरोत्तम दास ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 3अर्थ
    कहाँ हैं मेरे दोनों भट्ट, रघुनाथ भट्ट और गोपाल भट्ट? कहाँ हैं कृष्णदास कविराज? और नट-राज गौरांग एक साथ अचानक कहाँ चले गए?
1 पद अर्थ में 9

नरोत्तम दास ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 2अर्थ
    जो गौरांग का नाम लेता है, उसके हृदय में प्रेम का उदय होता है, मैं उस पर बलिहारी जाता हूँ। गौरांग के गुण सुनकर जो रो पड़ता है, उसके हृदय में राधा-कृष्ण की नित्य-लीला प्रकट हो जाती है, ऐसा व्यक्ति ही भक्ति का अधिकारी है।
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 2

भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 6भजन
    कर्म नाइ ज्ञान नाइ कृष्ण-भक्ति नाइ
    तबे बोलो कि-रूपे ओ श्री-चरण पाइ
  • पद 6अर्थ
    मुझमें न कर्म है, न ज्ञान है, न कृष्ण-भक्ति है। तो फिर मैं तुम्हारे श्रीचरणों को कैसे प्राप्त करूँ? कृपया मुझे बताओ।
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 2

भक्तिविनोद ठाकुर

  • पद 3भजन
    तुमि गुरु बोल्छो वटे, साधु-गुरु निष्कपटे,
    कृष्ण-नाम् देनो कर्ण-पुटे, से कि एमोन् होय् मेकि?
  • पद 3अर्थ
    तू बड़े विश्वास से अपने को निष्कपट साधु-गुरु बताता है, और भोले-भाले लोगों के कान में कृष्ण-नाम देकर उन्हें दीक्षा देता रहता है। क्या यह सब पाखण्ड नहीं है?
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 2

भक्तिविनोद ठाकुर

  • पद 2भजन
    धरि मन चरणे तोमार
    जानियाछि एबे सार, कृष्ण-भक्ति विना आर,
    नाहि घुचे जीवेर संसार
  • पद 2अर्थ
    हे मन, तुम्हारे चरण पकड़कर मैं यह विनती करता हूँ। अब हमने यह सार समझ लिया है कि कृष्ण की भक्ति के बिना जीव का यह संसार-भ्रम कभी नहीं मिटता।
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 2

नरोत्तम दास ठाकुर · प्रार्थना

  • पद 1भजन
    हरि हरि! कबे मोर हैबे सुदिन
    भजिब श्री-राधा-कृष्ण हञा प्रेमाधीन
  • पद 1अर्थ
    हरि हरि! मेरा वह शुभ दिन कब आएगा, जब मैं प्रेम में विवश होकर श्री राधा-कृष्ण की सेवा करूँगा?
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 2

वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    नमो महा-वदान्याय कृष्ण-प्रेम-प्रदाय ते
    कृष्णाय कृष्ण-चैतन्य-नाम्ने गौर-त्विषे नमः
  • पद 1अर्थ
    हे परम उदार अवतार! आप स्वयं कृष्ण हैं, जो श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट हुए हैं। आपने श्रीमती राधारानी की स्वर्णिम कान्ति धारण की है और आप कृष्ण-प्रेम को उदारतापूर्वक बाँट रहे हैं। हम आपको सादर प्रणाम करते हैं।
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 2

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 3भजन
    तुमि कृष्ण पूर्ण-बपु रसेर निदान
    तब पदे पोर्डि' तब गुण कोरि गान
  • पद 3अर्थ
    आप स्वयं भगवान कृष्ण हैं। आप उनका पूर्ण रूप हैं। आप वह स्रोत हैं जिससे रस की धाराएँ बहती हैं। आपके चरणों में गिरकर, मैं आपकी महिमा का गान करता हूँ।
2 पद भजन में 1

आदि शंकराचार्य

  • पद 1भजन
    अछ्युतं केशवं रामनारायणं
    कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम्
    श्रीधरं माधवं गोपिका वल्लभं
    जानकीनायकं रामछन्द्रं भजे
  • पद 4भजन
    कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण
    श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे
    अछ्युतानन्त हे माधवाधोक्षज
    द्वारकानायक द्रौपदीरक्षक
1 पद भजन में 2 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 3भजन
    जोगे जोगी पाय जाहा भोगे आज ह'बे ताहा
    हरि बोलि' खओ सबे भाइ
    कृष्णेर प्रसाद-अन्न त्रि-जगत कोरे धन्य
    त्रिपुरारि नाचे जाहा पाइ
  • पद 2अर्थ
    माता शची ने केले के फूल, दाल के बड़े और मसालेदार चच्चड़ी सब्ज़ी बनाई। उनकी शुद्ध भक्ति देखकर, भगवान कृष्ण ने उनका बनाया हुआ अन्न और सब्ज़ियाँ खाईं, जो अमृत के समान स्वादिष्ट थीं।
  • पद 3अर्थ
    जो योगी योग-साधना से पाते हैं, वह आज खाने से ही मिल जाएगा। हे मेरे भाइयों, "हरि!" कहकर सब मिलकर कृष्ण-प्रसाद पाओ। कृष्ण का प्रसाद तीनों लोकों को धन्य कर देता है; इसे पाकर भगवान् शिव भी नाचते हैं।
1 पद भजन में 2 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 3भजन
    पञ्च-बिंशति-गुण फुल-माला सु-शोभन
    धीराधीरा भाब-पट्ट-बासा
    पिहित-मान-धम्मिल्ला सौभाग्य-तिलकोज्ज्वला
    कृष्ण-नाम-जशः-कर्णोल्लासा
  • पद 3अर्थ
    उनके पच्चीस दिव्य गुण ही एक सुन्दर पुष्प-माला के समान उन्हें सुशोभित करते हैं। कृष्ण-प्रेम का धीर और अधीर भाव ही उनका वस्त्र है, जो कर्पूर से सुशोभित है; कृष्ण के प्रति उनका मान ही उनकी वेणी है, और सौभाग्य का तिलक उनके मस्तक पर चमक रहा है। श्रीकृष्ण के नाम और…
  • पद 4अर्थ
    उनके अधर कृष्ण-प्रेम के पान से सदा लाल रहते हैं। उनकी आँखों का काजल कृष्ण के प्रति उनकी प्रेम भरी चतुराई है, और उनकी मधुर मुसकान और हँसी-ठिठोली ही वह कर्पूर है जिससे वे सुगन्धित रहती हैं। वे कीर्ति और यश के अन्तःपुर में गर्व की शय्या पर शोभा पाती हैं, और…
1 पद भजन में 2 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 7भजन
    भक्तिबिनोदेर धन राधा-कृष्ण-श्री-चरण
    ताहे रति रहुँ निरन्तर
  • पद 6अर्थ
    वैष्णवों की कृपा के बल से तेरे सारे संदेह मिट जाएँगे, और तेरी आत्मा फिर तेरी हो जाएगी। तू वृन्दावन-धाम को प्राप्त करेगा, और नेत्रों में अश्रु तथा रोमांचित देह के साथ श्री श्री राधा-कृष्ण की सेवा करेगा।
  • पद 7अर्थ
    राधा-कृष्ण के श्री चरण ही भक्तिविनोद का परम धन हैं। उस धन में मेरी प्रीति निरंतर बनी रहे।
1 पद भजन में 2 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतमाला

  • पद 3भजन
    निरन्तर सेबा-मति बहिबे चित्तेते सती
    प्रशान्त होइबे आत्मा मोर
    ए भक्तिबिनोद बोले कृष्ण-सेबा-कुतूहोले
    चिरो-दिन थाकि जेन भोर
  • पद 1अर्थ
    हे कृष्ण! कोई और आश्रय न देखकर, मैं, यह दुष्ट-हृदय व्यक्ति, अब आपके चरणों की शरण ले चुका हूँ। हे प्रभु, अब मैं जान गया हूँ कि आप ही समस्त लोकों के स्वामी हैं, और मैं आपका नित्य सेवक हूँ।
  • पद 3अर्थ
    मेरा शान्त और पवित्र हृदय सदा आपकी सेवा की भावना से भर जाए, ऐसा कब होगा? भक्तिविनोद कहते हैं, कृष्ण की सेवा के आनन्द में मैं सदा डूबा रहूँ।
1 पद भजन में 2 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतमाला

  • पद 2भजन
    श्रीबास-मन्दिरे कि भाब उठिलो
    ताहा कि बर्णण होय
    भाब-युद्ध सने आनन्द-क्रन्दन
    उठे कृष्ण-प्रेम-मोय
  • पद 2अर्थ
    श्रीवास के घर में यह कैसा भाव उठा? इसका वर्णन कौन कर सके? परस्पर विरोधी भावों का महासंग्राम छिड़ गया, और कृष्ण-प्रेम से भरा आनन्दमय रुदन प्रकट हो उठा।
  • पद 5अर्थ
    "चाहे विपत्ति हो या सम्पत्ति, जिस दिन हम आपका स्मरण करते हैं, वही दिन शुभ है। हे कृष्ण! जिस दिन आपका स्मरण नहीं होता, वही दिन सचमुच विपत्ति का दिन है।
1 पद भजन में 2 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · बाउल संगीत

  • पद 4भजन
    न्यासी-मान-आशा त्यजि', दीन-भावे कृष्ण भजि',
    स्वभाव-गत धर्म यजि', नाश्' दोषाङ्कुर्
    तबे कृष्ण पा'बे, दुःख जा'बे ह'बे तुमि सु-चतुर्
  • पद 2अर्थ
    तू हर जगह भीख माँगता है, गर्व से स्वयं को अच्युत-गोत्र अर्थात् भगवान कृष्ण की शिष्य-परंपरा का बताता है, परन्तु गहरे ध्यान के दिखावे में तू केवल अपने जमा किए रुपयों और दूध का हिसाब लगाता रहता है। तू अपने पेट के लिए भीख माँगने में निपुण है, और दूसरों को शिक्षा…
  • पद 4अर्थ
    संन्यासी के रूप में सम्मान पाने की इच्छा त्यागकर विनम्र भाव से कृष्ण की भक्ति करो। अपने स्वभाव के अनुसार धार्मिक कर्तव्य निभाने से तुम्हारे दोषों के अंकुर नष्ट हो जाएँगे। तब तुम कृष्ण को प्राप्त करोगे, तुम्हारा दुःख दूर होगा, और तुम बड़े बुद्धिमान बन जाओगे।
1 पद भजन में 2 पद अर्थ में

नरोत्तम दास ठाकुर · प्रार्थना

  • पद 1भजन
    हरि हरि! बिफले जनम गोञाइनु
    मनुष्य-जनम पाइय राधा-कृष्ण ना भजिया
    जानिया शुनिया बिष खाइनु
  • पद 1अर्थ
    हे हरि, हे हरि! मैंने अपना जीवन व्यर्थ बिता दिया। मनुष्य-जन्म पाकर भी मैंने राधा-कृष्ण की भक्ति नहीं की, और जान-बूझकर विष का पान किया।
  • पद 3अर्थ
    व्रजराज के पुत्र कृष्ण ही शचीदेवी के पुत्र चैतन्य बनकर आए, और बलराम ही नित्यानन्द बने। जितने भी दीन-हीन और पतित थे, उन सबका हरिनाम से उद्धार हुआ। जगाई और माधाई इसके साक्षी हैं।
1 पद भजन में 2 पद अर्थ में

नरोत्तम दास ठाकुर · प्रार्थना

  • पद 3भजन
    राधा-कृष्ण श्रि-चरण सेइ मोर प्राण-धन
    सेइ मोर जीवन-उपाय
    जय पतित-पावन देह मोरे एइ धन
    तूया-विने अन्य नाहि भाय
  • पद 1अर्थ
    हे हरि! हे हरि! ऐसा दिन मेरा कब होगा, जब मैं राधा-कृष्ण दोनों के चरण-कमलों का दर्शन करूँगा, उन्हें स्पर्श करूँगा, और दोनों की सेवा करूँगा?
  • पद 3अर्थ
    राधा-कृष्ण और वृन्दावन धाम ही मेरे जीवन की सच्ची निधि हैं, वही मेरे जीवन का आधार हैं। हे पतितपावन! मुझे यह निधि दो, तुम्हारे बिना और कोई मुझे नहीं सुहाता।