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“जय राधा माधव” के परिणाम

536 भजन · 902 पद भजन के शब्दों में · 608 पद अर्थ में

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भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 3भजन
    जगन्नाथ-प्रसादान्न बिरिञ्चि-शम्भुर मन्य
    खाइले प्रेम होइबे उदोय
    एमोन दुर्लभ धन पैयाछो सर्ब-जन
    जय जय जगन्नाथ जय
  • पद 3अर्थ
    "ब्रह्मा और शिव भी भगवान जगन्नाथ के प्रसाद की पूजा करते हैं। जो इसे ग्रहण करता है, उसके भीतर दिव्य प्रेम जाग उठता है। अब तुम सभी ने यह दुर्लभ धन प्राप्त कर लिया है। जय, जय, जय जगन्नाथ की जय!"
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भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 2भजन
    शची-सुत गौर-हरि निमाइ-सुन्दर
    राधा-भाब-कान्ति-आच्छादित नट-बर
  • पद 2अर्थ
    हे शची के पुत्र (शची-सुत), हे गौरवर्ण कृष्ण (गौर-हरि), हे सुंदर निमाई (निमाई-सुंदर), हे राधा के प्रेम-भाव की कांति से आच्छादित प्रभु (राधा-भाव-कान्ति-आच्छादित), हे नृत्य में सर्वश्रेष्ठ (नटवर)!
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भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 3भजन
    ए सब न छेडे किसे पा'बे राधा कृष्ण
    (जतने छाडो छाडो हे)
    साधु-सङ्ग बिना आर कोथा तब इष्ट
    (साधु-सङ्ग कोरो कोरो हे) …
  • पद 3अर्थ
    यदि तुम इन सबको नहीं छोड़ोगे, तो श्री श्री राधा कृष्ण को कैसे प्राप्त करोगे? (प्रयत्न करके इन्हें छोड़ो! छोड़ो!) साधु-संग के बिना तुम अपना अभीष्ट कैसे प्राप्त करोगे? (साधु-संग करो! साधु-संग करो!) वैष्णवों के चरणों में डूब जाओ। तब तुम्हारे सारे अनिष्ट मिट…
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भक्तिविनोद ठाकुर · शरणागति

  • पद 3भजन
    चराओबि माधव! जामुन-तीरे
    बंशी बाजाओतो डाकोबि धीरे
  • पद 3अर्थ
    हे माधव! आप यमुना के तट पर मुझे चराएँगे। आप अपनी बाँसुरी बजाकर मुझे धीरे से बुलाएँगे।
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भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 5भजन
    बिनोद कोहिछे मन राधा-कृष्ण-श्री-चरण
    भजो भजो भजो निरन्तर
  • पद 5अर्थ
    हे मन! भक्तिविनोद तुझसे यह कहते हैं, सदा राधा-कृष्ण के श्री चरणों की उपासना कर, उपासना कर, उपासना कर।
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भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 5भजन
    बिनोदेर ए मिनति छारि' अन्य-जोग-गति
    कोरो' राधा-कृष्ण-अराधान
  • पद 5अर्थ
    यह भक्तिविनोद की विनती है: अन्य सभी योग-मार्गों को त्यागकर, राधा-कृष्ण की आराधना कर।
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भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 4भजन
    जदि थाके बहु धन निजे हो'बे अकिञ्चन
    बैष्णबेर कोरो उपकार
    जीबे दोया अनुखण राधा-कृष्ण-अराधन
    कोरो सदा हो'ये सदाचार
  • पद 4अर्थ
    यदि तेरे पास बहुत धन है, तो उसे अपने लिए मत रख, स्वयं अकिंचन बनकर वैष्णवों की सेवा में लगा दे। सब जीवों पर निरन्तर दया कर, सदा राधा-कृष्ण की आराधना कर, और सदाचारी बनकर रह।
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भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 7भजन
    बैष्णबेर परिचोय अबश्यक नाहि होय
    आडम्बरे कभु नाहि जाओ
    बिनोदेर निबेदन राधा-कृष्ण-गुण-गान
    फुकारि' फुकारि' सदा गाओ
  • पद 7अर्थ
    वैष्णव होने का बाहरी परिचय आवश्यक नहीं है। कभी दिखावे में मत पड़। भक्तिविनोद की यही विनती है: सदा ऊँचे स्वर में पुकार-पुकारकर राधा-कृष्ण के गुणों का गान करते रहो।
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भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 1भजन
    देखो मन ब्रते जेन ना हओ आच्छन्न
    कृष्ण-भक्ति आशा कोरि' आछो नाना ब्रत धोरि'
    राधा-कृष्णे कोरिते प्रसन्न
  • पद 1अर्थ
    हे मन, देख। बहुत से व्रत मत रख। भगवान की सीधी भक्ति की इच्छा से तू राधा-कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए अनेक व्रत धारण करता है।
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भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 7भजन
    श्री-चैतन्य-नाम सुने उदिबे पुलक
    राधा-कृष्णामृत-पाने हैबो अशोक
  • पद 7अर्थ
    श्री चैतन्य के नाम को सुनकर कब मेरे रोमांच उठेंगे? राधा-कृष्ण के अमृत का पान करके कब मैं शोक मुक्त हो जाऊँगा?
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भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 7भजन
    गोरा अबतारे ताँर श्री-जय-बिजोय
    नबद्वीपे शत्रु-भाबे होइलो उदोय
  • पद 7अर्थ
    गौर-अवतार में उनके श्री जय और विजय नवद्वीप में शत्रु-भाव से प्रकट हुए।
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भक्तिविनोद ठाकुर · गीतमाला

  • पद 1भजन
    श्रीबासेर प्रति चैतन्य-प्रसाद
    देखिया सकल जन
    जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द
    बोलि' नाचे घन घन
  • पद 1अर्थ
    श्रीवास पर चैतन्य महाप्रभु की कृपा देखकर सब लोग बार-बार नाचने लगे और पुकार उठे, "जय श्री चैतन्य! जय नित्यानन्द!"
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भक्तिविनोद ठाकुर · गीतमाला

  • पद 3भजन
    बुझिबारे से भजन बहु जत्न अकिञ्चन
    बिरचिलो भजन-दरपण
    ब्रजे राधा-कृष्ण-सेबा कोरिते उत्सुक जेबा
    सुखे तेँह कोरुण श्रबण
  • पद 3अर्थ
    इस भक्ति को समझाने के लिए ही इस दीन जन ने यह "भजन-दर्पण" लिखा है। जो व्रज में राधा-कृष्ण की सेवा के लिए उत्सुक हो, वह इस ग्रन्थ को सहर्ष सुने।
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भक्तिविनोद ठाकुर · गीतमाला

  • पद 3भजन
    बिभाबेते आलम्बन रसे नित्य प्रयोजन
    ब्रजे ताइ कृष्ण गोपीनाथ
    मदन-मोहन धन ब्रजाङ्गना गोपी-जन
    बल्लभ रसिक राधा-नाथ
  • पद 3अर्थ
    …रस के प्रकट होने के लिए आलम्बन आवश्यक हैं। व्रज में पहला आलम्बन स्वयं भगवान कृष्ण हैं, जो राधा और गोपियों के स्वामी हैं, गोपियों के प्रियतम हैं, दिव्य रसों के अमृत का आस्वादन करने वाले हैं, और कामदेव से भी अधिक मोहक और सुन्दर हैं। दूसरा आलम्बन व्रज की ये…
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भक्तिविनोद ठाकुर · गीतमाला

  • पद 2भजन
    एसो एसो सखी श्री-ललिता-गणे
    जानिबे तोमारे आज
    गृह-कथा छाडि' राधा-कृष्ण भजो
    त्यजिया धरम-लाज
  • पद 2अर्थ
    "सखी, आओ, हमारे साथ आओ। हम जानती हैं कि तुम ललिता के दल की हो। घर-गृहस्थी की बातें और धर्म-लाज का भय छोड़कर आओ, राधा-कृष्ण की भक्ति करो।"
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भक्तिविनोद ठाकुर · गीतमाला

  • पद 3भजन
    ए हेनो राधार चरण-जुगले
    परिचर्जा पा'बो कबे
    हह ब्रज-जन मोरे दोया कोरि'
    कबे ब्रज-बने लो'बे
  • पद 3अर्थ
    राधा के इन दोनों चरणों की सेवा मुझे कब मिलेगी? हे व्रजवासियों, तुम मुझ पर कब दया करके मुझे व्रज के वन में ले चलोगे?
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भक्तिविनोद ठाकुर · बाउल संगीत

  • पद 1भजन
    हो'ये विषये आवेश, पे'ले, मन, जातना अशेष
    छाडि' राधा-श्यामे ब्रज-धामे,
    भुग्छो हेथा नाना-क्लेश
  • पद 1अर्थ
    हे मेरे मन! भौतिक इन्द्रिय-भोग के वश में पड़कर तूने अपने ऊपर अनंत कष्ट ला लिया है। व्रज-धाम में राधा-श्याम का संग छोड़कर तू इस संसार में आ गया और अनेक पीड़ाओं को सहता रहा।
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नरोत्तम दास ठाकुर · प्रार्थना

  • पद 1भजन
    हरि हरि! कि मोर करम गति मन्द
    ब्रजे राधा-कृष्ण पद ना सेविनु तिल-आध
    ना भूझिनू रागेर सम्बन्ध
  • पद 1अर्थ
    हे हरि, हे हरि! मेरे कर्मों की गति कितनी मंद है! मैंने व्रज में राधा-कृष्ण के चरणों की सेवा एक पल के लिए भी नहीं की, और राग के इस संबंध को कभी नहीं समझा।
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नरोत्तम दास ठाकुर · प्रार्थना

  • पद 3भजन
    जमुनार जल जेन अमृत समान हेन
    कबे पिब उदर पूरिया
    कबे राधा-कुण्ड-जले स्नान करि कुतूहले
    श्यम-कुण्डे रहिब पडिया
  • पद 3अर्थ
    यमुना का जल अमृत के समान है, कब मैं उसे भर पेट पिऊँगा? कब आनंद से राधा-कुंड के जल में स्नान करूँगा, और श्याम-कुंड पर सदा के लिए पड़ा रहूँगा?
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नरोत्तम दास ठाकुर · प्रार्थना

  • पद 4भजन
    श्याम-कुण्डे राधा-कुण्डे स्नान
    करि कबे जुडाब पराण
  • पद 4अर्थ
    श्याम-कुंड और राधा-कुंड में स्नान करके, कब मेरा प्राण शांत और शीतल होगा?