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“गौर आरती” के परिणाम

439 भजन · 566 पद भजन के शब्दों में · 472 पद अर्थ में

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1 पद भजन में 3 पद अर्थ में 10

नरोत्तम दास ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 4भजन
    पाषाणे कुटिबो माथा अनले पशिबो
    गौराङ्ग गुणेर निधि कोथा गेले पाबो
  • पद 3अर्थ
    कहाँ हैं मेरे दोनों भट्ट, रघुनाथ भट्ट और गोपाल भट्ट? कहाँ हैं कृष्णदास कविराज? और नट-राज गौरांग एक साथ अचानक कहाँ चले गए?
  • पद 4अर्थ
    मैं पत्थर पर अपना सिर पटक दूँगा, या अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा। गुणों के भण्डार गौरांग को पाने के लिए मैं कहाँ जाऊँ?
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  • पद 5अर्थ
    जिन सब संगियों के साथ गौरांग ने लीला की, उनकी वह संगति न पाकर नरोत्तम दास बस रोते रहते हैं।
3 पद भजन में 6

भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 5भजन
    माधवेन्द्र पुरी-बर, शिष्य-बर श्री-ईश्वर,
    नित्यानन्द, श्री-अद्वैत विभु
    ईश्वर-पुरीके धन्य, कोरिलेन् श्री-चैतन्य,
    जगद्-गुरु गौर महाप्रभु
  • पद 8भजन
    विश्वनाथ-भक्त-साथ, बलदेव जगन्नाथ,
    तार प्रिय श्री-भक्तिविनोद
    महा-भागवत-बर, श्री-गौरकिशोर-बर,
    हरि-भजनेते जा'र मोद
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  • पद 9भजन
    ईहारा परमहंस, गौराङ्गेर निज-बंश
    तादेर चरणे मम गति
    आमि सेबा-उदासीन, नामेते त्रिदण्डी दीन
    श्री-भक्तिसिद्धान्त सरस्वती
2 पद भजन में 4 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    प्रभुर लागिया यब कोन् देशे
    एक मोरे सन्धान कबे
    गौराङ्ग-चरण दरशन पाब
    हेन भाग्य मोर हबे
  • पद 4भजन
    गौराङ्ग-चरण- धूलिते मिशिबे
    ए छार शरीर मोर
    कहे रामचन्द्र पाद-पद्म-मधु
    आस्वादि रहिब भोर
  • पद 1अर्थ
    कब मैं उन स्थानों पर जाऊँगा जहाँ गौरांग प्रभु गए थे? कब मुझे गौरांग प्रभु के चरण-चिह्नों के दर्शन होंगे? कब मैं इस प्रकार भाग्यशाली बनूँगा?
  • पद 2अर्थ
    गौर प्रभु मेरे स्वामी हैं। गौर प्रभु मेरे जीवन का लक्ष्य हैं। गौर प्रभु ही मेरा एकमात्र धन हैं। यदि मैं उनके दर्शन न कर सका, तो राख के समान इस व्यर्थ जीवन को त्याग दूँगा।
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  • पद 3अर्थ
    मेरे प्राण पक्षी बन जाएँगे। आकाश में उड़कर वे उस स्थान पर जाएँगे जहाँ गौर प्रभु निवास करते हैं। मैं सदा प्रभु के निकट रहूँगा। मैं उनका सेवक बनूँगा।
  • पद 4अर्थ
    मेरे शरीर की राख गौर प्रभु के चरण-चिह्नों की धूल पर बिखेर दी जाए। रामचन्द्र दास कहते हैं: वहीं मैं आनंद-विह्वल होकर गौर प्रभु के चरण-कमल का अमृत चखते हुए रहूँगा।
3 पद भजन में 4

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के और भजन

  • पद 5भजन
    हरिजन-द्वेष, प्रतिस्थाशा-क्लेश,
    कोरो केनो तबे ताहार् गौरव
    वैष्णवेर् पाछे, प्रतिस्थाशा आछे,
    ता'ते कभु नाहे 'अनित्य-वैभव'
  • पद 7भजन
    कीर्तन छाडिबो, प्रतिष्ठा माखिबो,
    कि काज ढुडिया तादृश गौरव
    माधवेन्द्र पुरी, भाव-घरे चुरि,
    ना कोरिलो कभु सदाइ जानबो
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  • पद 17भजन
    राधा-दास्ये रोहि', छाडि 'भोग-अहि,'
    'प्रतिष्ठाशा' नहे 'कीर्तन-गौरव'
    'राधा-नित्य-जन,' ताहा छाडि' मन,
    केनो वा निर्जन-भजन-कैतव
2 पद भजन में 3 पद अर्थ में 1

भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 3भजन
    जाह्नबी-पुलिने चिन्मोय-कानने
    बासिया बिजन-स्थले
    कृष्ण-नामामृत निरन्तर पिबो
    डाकिबो गौराङ्ग बोले
  • पद 4भजन
    हा गौर-निताइ तोरा दु'टी भाइ
    पतित-जनेर बन्धु
    अधम पतित आमि हे दुर्जन
    हओ मोरे कृपा सिन्धु
  • पद 3अर्थ
    गंगा के तट पर, चिन्मय वन में, किसी एकान्त स्थान में रहते हुए, मैं निरन्तर श्रीकृष्ण-नाम के अमृत का पान करूँगा। मैं पुकारूँगा: 'गौरांग!'
  • पद 4अर्थ
    हा गौर-निताई! तुम दोनों भाई पतितजनों के बन्धु हो। मैं बहुत पतित और पापी हूँ। मुझ पर कृपा करो, मुझे अपनी कृपा के सागर में तैरने दो।
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  • पद 6अर्थ
    'हा हा! हे मेरे मन के चोर! यह मैंने क्या देखा!' यह कहकर मैं मूर्छित हो जाऊँगा। चेतना पाकर मैं एकान्त में रोऊँगा, और स्मरण करूँगा कि यह सब गौर-नित्यानन्द की कृपा का एक कण मात्र था।
1 पद भजन में 2 पद अर्थ में 7

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    जीव् जागो, जीव् जागो, गौरचान्द बोले
    कोत निद्रा जाओ माया-पिशाचीर कोले
  • पद 1अर्थ
    जीव जागो, जीव जागो, गौरांग पुकार रहे हैं: 'तुम कब तक माया-पिशाचिनी की गोद में सोए रहोगे?'
  • पद 5अर्थ
    भक्तिविनोद ने प्रभु गौरांग के चरणों में गिरकर, विनती करके वह हरे कृष्ण महामंत्र प्राप्त किया।
3 पद भजन में 3

स्वरूप दामोदर गोस्वामी

  • पद 2भजन
    नवोज्ज्वलादि- भावना-विधान-कर्म-पारगं
    विचित्र-गौर-भक्ति-सिन्धु-रङ्ग-भङ्ग-लासिनम्
    सुराग-मार्ग-दर्शकं व्रजादि-वास-दायकं
    भजाम्य् अहं गदाधरं सुपण्डितं गुरुं प्रभुम्
  • पद 3भजन
    शचीसुताङ्घ्रि-सार-भक्त-वृन्द-वन्द्य-गौरवं
    गौर-भाव-चित्त-पद्म-मध्य-कृष्ण-वल्लभम्
    मुकुन्द-गौर-रूपिणं स्वभाव-धर्म-दायकं
    भजाम्य् अहं गदाधरं सुपण्डितं गुरुं प्रभुम्
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  • पद 7भजन
    मुदा निज-प्रियादिक-स्वपाद-पद्म-सिन्धुभिर्
    महा-रसार्णवामृत-प्रदेष्ट-गौर-भक्तिदं
    सदाष्ट-सात्त्विकान्वितं निजेष्ट-भक्ति-दायकं
    भजाम्य् अहं गदाधरं सुपण्डितं गुरुं प्रभुम्
1 पद भजन में 3 पद अर्थ में 3

श्री क्षणदा-गीत-चिन्तामणि

  • पद 4भजन
    आनन्द-कन्द गौरचन्द्र
    अकिञ्चने बड दया
    कृष्ण-दास करत आश
    ओ पद-पङ्कज-छाया
  • पद 1अर्थ
    प्रेमोल्लास से अभिभूत होकर गौर प्रभु नृत्य करते हैं। एक क्षण वे 'हरि!' कहकर पुकारते हैं। दूसरे क्षण वे वृन्दावन के स्मरण में मग्न हो जाते हैं। क्षण-क्षण वे श्री राधा का भाव धारण करते हैं, जो कृष्ण के प्राणों की स्वामिनी हैं।
  • पद 3अर्थ
    'था थै! ता थै!' मृदंग बोल उठते हैं। 'झन झन!' करताल कहते हैं। गौर प्रभु के कमल-नयनों से आँसुओं की गंगा बहती है। उनके गले में वनमाला झूमती है।
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  • पद 4अर्थ
    गौरचंद्र प्रभु समस्त आनंद के मूल हैं। जिन भक्तों के पास उनके अतिरिक्त कोई धन नहीं है, उन पर वे अत्यंत दयालु हैं। कृष्णदास उनके चरण-कमलों की छाया पाने के लिए तरसते हैं।
2 पद भजन में 3 पद अर्थ में

श्री क्षणदा-गीत-चिन्तामणि

  • पद 1भजन
    पतित हेरिया कान्दे थिर नाहिक बण्धे
    करुणा नयने चाय
    निरुपम हेम जनु उजोर गौर-तनु
    अबनी घन गडि याय
  • पद 4भजन
    ऐछन सदय- हृदय प्रेममय
    गौर भेल परकाश
    प्रेम-धने धनी करल अबनी
    बञ्चित गोबिन्द दास
  • पद 1अर्थ
    पतित जीवों को देखकर वे रो पड़े। उन्हें शांति नहीं मिली। उन्होंने करुणा भरी दृष्टि से उन्हें निहारा। उनका गौर शरीर अनुपम स्वर्ण के समान चमकता है। भाव-विभोर होकर वे भूमि पर लोटने लगे।
  • पद 2अर्थ
    मैं गौर प्रभु की महिमा से अभिभूत हूँ। मैं उनके रूप की मधुरता और उनके प्रेमोल्लास को नहीं भुला सकता। मैं उनका एक तिल भर भी नहीं भुला सकता।
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  • पद 4अर्थ
    गौर प्रभु प्रेम से परिपूर्ण हैं। वे इस प्रकार दयालु हैं। उन्होंने संपूर्ण संसार को प्रेम के धन से धनी बना दिया। केवल गोविन्द दास ही उस धन से वंचित रह गए।
2 पद भजन में 3 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 2भजन
    उनमत नित्यानन्द आचार्य अद्वैतचन्द्र
    पण्डित श्रीबास हरिदास
    ए सभारे सङ्गे करि माझे नाचे गौर-हरि
    भकत-मण्डल चारि-पाश
  • पद 4भजन
    भाबाबेशे गौर राय नाचिते नाचिते याय
    धीरे धीरे चले जगन्नाथ
    आनन्द बिस्मय मन देखि प्रेम-सङ्कीरतन
    निज परिकर-गण साथ
  • पद 2अर्थ
    श्री नित्यानन्द, श्री अद्वैतचन्द्र आचार्य, श्रीवास पण्डित और हरिदास ठाकुर आनन्द से उन्मत्त हैं। भक्तों के मण्डल के मध्य श्री गौर-हरि नृत्य करते हैं।
  • पद 3अर्थ
    श्री गौर-हरि "हरि! हरिबोल!" का जाप करते हैं। उनके नृत्य करते चरणों से पृथ्वी काँप उठती है। उनकी आँखों से आँसुओं की धारा बहती है। वे दिव्य प्रेम की तरंगों में क्रीड़ा करते हैं। उनका तेजस्वी शरीर स्वर्णिम सुमेरु पर्वत को भी परास्त कर देता है। वे आठ सात्त्विक…
इस भजन में 1 और मिलान दिखाएँ
  • पद 4अर्थ
    दिव्य भाव से भरकर श्री गौर चलते-चलते नाचते ही रहते हैं। धीरे-धीरे श्री जगन्नाथ अपने रथ में आगे बढ़ते हैं। श्री गौर-हरि को अपने निजी सहचरों के साथ प्रेम-कीर्तन की लीला का आनन्द लेते देख, प्रत्येक व्यक्ति का हृदय आनन्द और आश्चर्य से भर जाता है।
2 पद भजन में 3 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 6भजन
    जय शची-सुत गौराङ्ग-सुन्दर
    जय नित्यानन्द पद्माबतीर कोँअर
  • पद 10भजन
    जय गौर-भक्त-बृन्द दया कर मोरे
    सबार चरण-धूलि धरि निज शिरे
  • पद 6अर्थ
    जय जय हो सुंदर गौरांगसुंदर की, जो शची के पुत्र हैं! जय हो नित्यानन्द प्रभु की, जो पद्मावती के पुत्र हैं!
  • पद 7अर्थ
    जय जय हो सीता के पति अद्वैत गोसाईं की! उनकी ही कृपा के बल से मैं गौर प्रभु की महिमा गाता हूँ।
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  • पद 10अर्थ
    जय हो गौर प्रभु के भक्तों की! हे भक्तगण, मुझ पर कृपा करें। मैं आप सबके चरणों की धूल लेता हूँ। वह धूल अपने मस्तक पर धारण करता हूँ।
4 पद भजन में

शिवानन्द सेन

  • पद 1भजन
    जय जय पण्डित गोसाइ, जार कृपाबले से चैतन्य गुण गाइ
    हेन से गौरचन्द्रे जाहार पिरीति
  • पद 2भजन
    गदाधर प्राणनाथ जाहे लागे ख्याति, गौरगत प्राण प्रेम के बुझिते पारे
    क्षेत्र वास कृष्ण सेवा जार लागि छाड़े
इस भजन में 2 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    गदाइर गौराङ्ग गौराङ्गेर गदाधर, श्री राम जानकी जेन एक कलेबर
    जेन एक प्राण राधा वृन्दावन चन्द्र
  • पद 4भजन
    तेन गौर गदाधर प्रेम तरङ्ग, कहे शिवानन्द पहु जार अनुरागे
    श्याम तनु गौराङ्ग हइया प्रेम मागे
2 पद भजन में 13

वासुदेव घोष · वैष्णव आचार्यों के और भजन

  • पद 4भजन
    श्री-राधार् भावे एबे गोरा अवतार्
    हरे कृष्ण नाम् गौर करिल प्रचार्
    ए-बार् प्रचार् जेइ करिल हरे कृष्ण महा-मन्त्र
    प्रचार् जेइ करिल हरे कृष्ण महा-मन्त्र …
  • पद 5भजन
    वासुदेव घोष बोले कोरि जोड हात्
    जेइ गौर सेइ कृष्ण सेइ जगन्नाथ्
    सेइ तो' एसेछे, सेइ तो' एसेछे
    ओइ ब्रज हो'ते नदीयारे सेइ तो' एसेछे …
3 पद अर्थ में 12

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1अर्थ
    पूर्व दिशा में लाल आभा उदय हुई और द्विजों के रत्न गौरसुंदर तुरंत जाग उठे। भक्तों के समूह को साथ लेकर वे नदिया के गाँवों और नगरों में निकल पड़े।
  • पद 2अर्थ
    "ताथई ताथई" की ध्वनि से मृदंग बज उठे, और उनके साथ ताल में झाँझ झनकने लगी। प्रेम में गौरांग का सोने-सा शरीर हल्के-हल्के काँप रहा है, और चरणों में नूपुर बज रहे हैं।
इस भजन में 1 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3अर्थ
    गौरहरि लोगों को पुकारकर कहते हैं, "मुकुन्द, माधव, यादव, हरि", ये नाम अपराध छोड़कर मुँह भरकर बोलो। तुमने रातें व्यर्थ नींद में और दिन शरीर सजाने में बिता दिए।
2 पद भजन में 6

लोचन दास ठाकुर · और भजन

  • पद 2भजन
    कण्टकेर तरु, सदाइ सेविलि (मन), अमृत पाइबार आशे
    प्रेम-कल्पतरु, श्री गौराङ्ग आमार, ताहारे भाविलि विषे
  • पद 5भजन
    संसार भजिलि, श्री गौराङ्ग भुलिलि, ना सुनिलि साधुर कथा
    इह परकाल, दु’काल खोयालि (मन), खाइलि आपन माथा
2 पद भजन में 5

भगवान शिव

  • पद 4भजन
    तडित्-सुवर्ण-चम्पक-प्रदीप्त-गौर-विग्रहे
    मुख-प्रभा-परास्त-कोटि-शारदेन्दु-मण्डले
    विचित्र-चित्र-सञ्चरच्-चकोर-शाव-लोचने
    कदा करिष्यसीह मां कृपा-कताक्ष-भाजनम्
  • पद 10भजन
    अनेक-मन्त्र-नाद-मञ्जु-नूपुरारव-स्खलत्
    समाज-राज-हंस-वंश-निक्वणाति-गौरवे
    विलोल-हेम-वल्लरी-विडम्बि-चारु-चङ्क्रमे
    कदा करिष्यसीह मां कृपा-कताक्ष-भाजनम्
1 पद भजन में 4 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 3भजन
    तबे मूर्ख-जन केनो शास्त्र बिचारिया
    गौर-लीला नाहि माने अन्त ना पाइया
  • पद 3अर्थ
    तो फिर मूर्ख लोग शास्त्रों का विचार करके, उनमें इसका अंत न पाकर, गौर-लीला को क्यों नहीं मानते?
  • पद 5अर्थ
    कृष्ण अपनी ही इच्छा से गौर रूप में प्रकट हुए। अपने संपूर्ण वैकुंठ-धाम को साथ लेकर वे नवद्वीप में अवतरित हुए।
इस भजन में 2 और मिलान दिखाएँ
  • पद 7अर्थ
    गौर-अवतार में उनके श्री जय और विजय नवद्वीप में शत्रु-भाव से प्रकट हुए।
  • पद 9अर्थ
    स्मृति और तर्क-शास्त्रों की दुहाई देकर वे शत्रु बनकर प्रकट हुए और गौरचंद्र से युद्ध करने में तत्पर हो गए।
1 पद भजन में 4 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    हरि हरि ऐछे भाग्य होयब हामार
    सहचर सङ्गे रङ्गे पहुं गौरक
    हेरब नदीया-बिहार
  • पद 1अर्थ
    हरि! हरि! कब मैं भाग्यशाली बनूँगा? कब मैं गौर प्रभु को अपने पार्षदों के साथ नदिया में लीला करते देखूँगा?
  • पद 3अर्थ
    कब मैं गौर प्रभु को श्रीवास के घर में आसन पर बैठे देखूँगा? उनके दाहिने खड़े निताई प्रभु गौर प्रभु के मस्तक पर छत्र धारण करेंगे। गदाधर पण्डित गौर प्रभु के बाईं ओर खड़े होंगे।
इस भजन में 2 और मिलान दिखाएँ
  • पद 4अर्थ
    जो कोई वहाँ जाएगा, वह गौर प्रभु के चन्द्रमुख के दर्शन करेगा। उसके रोम-रोम पुलकित हो उठेंगे। वह प्रेमानंद प्राप्त करेगा।
  • पद 5अर्थ
    कब माता शची के बुलाने पर मुझे गौर प्रभु के भोजन का कई मुट्ठी प्रसाद मिलेगा? कब रामानंद आनंद से गौर प्रभु के दर्शन करेंगे? तब रामानंद के दोनों नेत्र सफल हो जाएँगे।
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 11

लोचन दास ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    परम कोरुण, पहू दुइ जन
    निताइ गौरचन्द्र
    सब अवतार-सार शिरोमणि
    केवल आनन्द-कन्द
  • पद 1अर्थ
    परम दयालु दोनों प्रभु, निताई और गौरचन्द्र, समस्त अवतारों के सार और शिरोमणि हैं। वे केवल आनन्द के मूल स्रोत हैं।
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 10

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    …(एइ) शिखा दिया, सब् नदीया
    फिर्छे नेचे' गौर-निताइ
    (मिछे) मायार् बोशे, जाच्छो भेसे',
    खाच्छो हाबुडुबु, भाइ
  • पद 1अर्थ
    "राधा-कृष्ण" बोलो, बोलो, सब बोलो! यह शिक्षा देते हुए गौर-निताई सारे नदिया में नाचते हुए घूम रहे हैं। हे भाइयो, तुम व्यर्थ ही माया के वश में बहे जा रहे हो, कभी डूबते और कभी उभरते हुए।