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“जय राधा माधव” के परिणाम

536 भजन · 902 पद भजन के शब्दों में · 608 पद अर्थ में

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1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 14

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 3भजन
    माया-जाले बद्ध हो 'ये, आछो मिछे काज लो 'ये,
    एखोन चेतन पे'ये, 'राधा-माधव्' नाम् बोलो रे
  • पद 3अर्थ
    तुम माया के जाल में बँधे हुए हो, व्यर्थ कार्यों में लगे हुए हो। अब जब तुम्हें यह चेतना मिली है, तो 'राधा-माधव' का नाम लो।
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 11

वैष्णव आचार्यों के और भजन

  • पद 1भजन
    हरि हे दोयाल् मोर् जय राधा-नाथ्
    बारो बारो एइ-बारो लोहो निज साथ्
  • पद 1अर्थ
    हे हरि! हे मेरे दयालु प्रभु! हे राधा के नाथ, आपकी जय हो! मैं बार-बार आपसे विनती करता रहा हूँ, और अब फिर से आपसे प्रार्थना करता हूँ कि मुझे अपना बना लें।
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 11

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के और भजन

  • पद 3भजन
    नदीया-शशधर्, मायापुर्-ईश्वर्,
    नाम-प्रवर्तन सुर
    गृहि-जन-शिक्षक, न्यासि-कुल-नायक,
    माधव राधा-भाव-पूर
  • पद 3अर्थ
    …(गृहि-जन-शिक्षक)। वे संन्यासियों के नायक हैं (न्यासी-कुल-नायक)। वे लक्ष्मी के पति हैं (माधव), और श्रीमती राधारानी के भाव से पूर्ण हैं (राधा-भाव-पूर)।…
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 9

नरोत्तम दास ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 4भजन
    गौर-प्रेम-रसार्णवे, से तरङ्गे जेबा डुबे,
    से राधा-माधव-अन्तरङ्ग
    गृहे बा वनेते थाके, 'हा गौराङ्ग' बो'ले डाके,
    नरोत्तम मागे तार सङ्ग
  • पद 4अर्थ
    गौर-प्रेम के रस-सागर की लहरों में जो डूब जाता है, वह राधा-माधव का अन्तरंग सेवक बन जाता है। वह घर में रहे या वन में, जो 'हा गौरांग!' कहकर पुकारता है, नरोत्तम उसी का संग माँगते हैं।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 3भजन
    तहे एक स्वर्णमोयी लता सर्ब-धाम-जयी
    उठियाछे परम-पाबनी
    ह्लादिनी-शक्तिर सार महा-भाब नाम जार
    त्रिभूबन-मोहन-मोहिनी
  • पद 4भजन
    राधा-नामे परिचित तुषिया गोबिन्द-चित
    बिराजये परम आनन्दे
    सेइ लता-पत्र-फुल ललितादि-सखी-कुल
    सबे मिलि' बृखे दृढ बन्धे
  • पद 4अर्थ
    'राधा' नाम से जानी जाने वाली यह लता गोविन्द के हृदय को प्रसन्न करती हुई परम आनन्द में सुशोभित रहती है। इस लता के पत्ते और फूल, जो ललिता आदि सखियाँ हैं, सब मिलकर उस तमाल वृक्ष को दृढ़ता से आलिंगन में बाँधे रहते हैं।
  • पद 7अर्थ
    भक्तिविनोद उन दोनों (राधा-कृष्ण) के मिलन की ही कामना करते हैं। इसके अतिरिक्त वे कभी कुछ और नहीं चाहते।
4 पद भजन में 5 पद अर्थ में

रघुनाथ दास गोस्वामी

  • पद 2भजन
    पुरो गोभिः सार्धम् व्रज-नृपति-मुख्या व्रज-जना
    व्रजन्त्य् एषाम् पश्चान् निखिल-महिलाभिर् व्रज-नृपा
    ततो मित्र-व्रातैः कृत-विविध-नर्मा व्रज-शशी
    छलैः पश्यन् राधाम् सहचरि परिक्रामति गिरिम्
  • पद 4भजन
    उद्दाम-नर्म-रस-केलि-विनिर्मिताङ्गम्
    राधा-मुकुन्द-युगलम् ललिता-विशाखे
    गौराङ्ग-चन्द्रम् इह रूप-युगम् न पश्यन्
    हा वेदनाः कति सहे स्फुट रे ललाट
  • पद 2अर्थ
    …व्रज-चन्द्र अपने मित्रों की टोली के साथ तरह-तरह की हँसी-ठिठोली करते हुए, बहाने बना-बनाकर राधा की ओर देखते हुए, हे सखी, पर्वत की परिक्रमा करते हैं।…
  • पद 3अर्थ
    वह युवा दिव्य युगल, जो अपनी करुणा के उमड़ते अमृत के दान से जगत को जीवन देते हैं, जो अपने गुणों के फूलों की सुगंध से हर किसी को सुवासित करते हैं, यदि वे मुझ पर ऐसी कृपा न बरसाएं, तो हे सखी, ऐसा प्रबंध कर दो कि मेरी सारी देह श्री राधाकुंड में ही निवास करे।
इस भजन में 5 और मिलान दिखाएँ
  • पद 6भजन
    उपगिरि गिरि-धर्तुः सु-स्मिते वक्त्र-बिम्बे
    भ्रमति निभृत-राधा नेत्र-भङ्गी-च्छलेन
    अति-तृषित-चकोरी लालसेवाम्बुदस्यो-
    परि शशिनि सुधाढ्ये मध्य आकाश-देशम्
  • पद 7भजन
    द्युति-जित-रति-गौरी-क्ष्मा-रमा-सत्यभामा-
    व्रज-पुर-वर-नारी-वृन्द-चन्द्रावलीकाम्
    गिरि-भृत इह राधाम् तन्वतो मण्डिताम् तत्
    तद्-उपकरणम् अग्रे किम् निधास्ये क्रमेण
  • पद 4अर्थ
    हे ललिता और विशाखा! जिनके अंग बेरोक हँसी-ठिठोली की क्रीड़ा से रचे गए हैं, राधा और मुकुन्द के उस युगल को, श्री गौरांगचन्द्र को और रूप-युगल (श्री रूप और श्री सनातन) को यहाँ न देखकर, हाय, मैं कितनी वेदनाएँ सहूँ! हे मेरे ललाट, तू फट जा!
  • पद 6अर्थ
    पर्वत के निकट, गिरिधारी के मुस्कुराते हुए चंद्रमुख पर, एकांत में राधा की आँखें तिरछे कटाक्षों के बहाने भटकती हैं, जैसे कोई अत्यंत प्यासी चकोरी सागर से उदित सुधामय चंद्रमा के चारों ओर बीच आकाश में मंडराती है।
  • पद 7अर्थ
    राधा, जो अपनी दीप्ति से रति, गौरी, पृथ्वी-देवी, सत्यभामा, और व्रज-नगरी की चंद्रावली सहित सर्वश्रेष्ठ स्त्रियों के पूरे समूह को भी जीत लेती हैं, जिन्हें पर्वतधारी यहाँ सजाते और अलंकृत करते हैं, मैं उनके आगे क्रमशः कौन-सा आभूषण अर्पित करूँ?
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

प्रबोधानन्द सरस्वती

  • पद 1भजन
    वसतु मनो मम मदन-गोपाले
    नव-रति-केलि-विलास-परावधि-राधा-सुरत-रसाले
  • पद 11भजन
    रसिक-सरस्वती-वर्णित-माधव-रूप-सुधा-रस-सारे
    रमयत साधु बुधा निज-हृदयं भ्रमथ मुधा किम् असारे
  • पद 1अर्थ
    मेरा मन मदन-गोपाल में निवास करे, जो सदा-नूतन प्रेम-लीलाओं की चरम सीमा हैं, जो राधा के साथ प्रेम-क्रीड़ा के रस का अन्तिम सीमा तक आस्वादन करते हैं।
  • पद 11अर्थ
    रसिक भक्तों की वाणी द्वारा माधव के अमृतमय सौन्दर्य के सार रूप में वर्णित, हे बुद्धिमानो, तुम्हारा हृदय सचमुच उन्हीं में आनन्दित हो। हे मूर्खो, तुम व्यर्थ वस्तुओं के पीछे क्यों भटकते हो?
4 पद भजन में 5 पद अर्थ में

नरोत्तम दास ठाकुर

  • पद 1भजन
    युगल चरणे प्रीति, परम आनन्द ताथि,
    रति प्रेम-मय परबन्धे
    कृष्ण नाम राधा-नाम, उपाय कोरो रस धाम,
    चरणे पोड़िया परानन्दे
  • पद 12भजन
    कृष्ण प्रभु एक-बार करिबेन अङ्गीकार
    जेन मन ए सत्य बचन
    धन्य लीला बृन्दाबन राधा-कृष्ण-श्री-चरण
    धन्य सखी मञ्जीरिर गान
  • पद 1अर्थ
    युगल चरणों में प्रीति ही परम आनंद है। परम बंधु के प्रति प्रेममय अनुराग हो। कृष्ण-नाम और राधा-नाम को रस-धाम पाने का साधन बनाओ, और परम आनंद से उनके चरणों में गिर जाओ।
  • पद 12अर्थ
    प्रभु कृष्ण किसी दिन हमें अवश्य स्वीकार करेंगे, हे मन, इसे सत्य वचन जान। धन्य हैं वृन्दावन की लीलाएँ, धन्य हैं राधा-कृष्ण के दिव्य चरण, धन्य है सखियों के नूपुरों की ध्वनि।
इस भजन में 5 और मिलान दिखाएँ
  • पद 17भजन
    अन्येर परश येनो, नहे कदाचित हेनो,
    इहाते होइबो साबधान
    राधा-कृष्ण नाम गान, एइ से परम ध्यान,
    आर ना कोरिहो परमाण
  • पद 20भजन
    राधा कृष्ण सेवन, एकान्त कोरिया मन,
    चरण कमल बोलि याओ
    दोँहार नाम गुण शुनि, भक्त मुखे पुनि पुनि,
    परम आनन्द सुख पाउ
  • पद 17अर्थ
    मेरा संपर्क कभी अन्य किसी से न हो, इसमें मैं सावधान रहूँगा। राधा-कृष्ण का नाम-कीर्तन ही परम ध्यान है, इसके सिवा और किसी को प्रमाण मत मान।
  • पद 20अर्थ
    राधा-कृष्ण की सेवा में मन को एकाग्र करके, उनके चरण-कमलों की चर्चा करते रहो। दोनों के नाम और गुणों को भक्तों के मुख से बार-बार सुनकर मुझे परम आनंद का सुख मिलता है।
  • पद 21अर्थ
    राई (राधा) का स्वर्ण-सा गौर शरीर, मेरी आँखें उसके दर्शन को तरसती हैं, मैं व्याकुल होकर रोऊँगा। श्रीकृष्ण के अंग जलभरे मेघ के समान चिकने-साँवले और अत्यंत मनोहर हैं, उनके रूप से सारा विश्व प्रकाशित होता है।
2 पद भजन में 1 पद अर्थ में 1

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 4भजन
    राधिका-रञ्जन रास-रसायन
    राधा-कुण्ड-कुञ्ज-बिहारी
    राम कृष्ण हरि माधब नरहरि
    मत्स्यादि-गण-अबतारी
  • पद 5भजन
    गोबिन्द बामन श्री-मधुसूदन
    जादब-चन्द्र बन-माली
    कालिय-शातन गोकुल-रञ्जन
    राधा-भजन-सुख-शाली
  • पद 4अर्थ
    ...राधिका-रञ्जन (राधा को आनन्दित करने वाले), रास-रसायन (रासलीला का आस्वादन करने वाले), राधा-कुण्ड-कुञ्ज-विहारी (राधा-कुण्ड के कुञ्जों में लीला करने वाले), राम (परम भोक्ता), कृष्ण (सर्वाकर्षक), हरि (सब अशुभ को हरने वाले), माधव (लक्ष्मी के पति), नरहरि (नर-सिंह…
1 पद भजन में 3 पद अर्थ में

स्तवामृत-लहरी

  • पद 5भजन
    फुल्ल-माधवी-रसाल-नीप-कुञ्ज-मण्डले
    भृङ्ग-कोक-कोकिलादि-काकली यद् अञ्चति
    अष्ट-यामिकावितर्क-कोटि-भेद-सौरभं
    तत्र कृष्ण-कुण्ड एव संस्थितिः स्तुतास्तु नः
  • पद 3अर्थ
    जब राधा ने कहा, “गौ-वध (अरिष्टासुर-वध) के प्रायश्चित के लिए आपको तीनों लोकों के करोड़ों तीर्थों में स्नान करना होगा,” तब कृष्ण ने समस्त तीर्थों को बुलाकर अपनी एड़ी से उत्पन्न इस सरोवर में प्रसन्नतापूर्वक स्नान किया। आओ, हम कृष्ण-कुण्ड में निवास की महिमा गाएँ।
  • पद 5अर्थ
    जो आम, कदम्ब और अनेक माधवी लताओं के कुंजों से घिरा है, जहाँ चकवा, कोकिल और भ्रमरों का मधुर कलरव गूँजता है, और रात्रि में करोड़ों अकल्पनीय सुगन्धें फैली रहती हैं, आओ, हम उस कृष्ण-कुण्ड में निवास की महिमा गाएँ।
इस भजन में 1 और मिलान दिखाएँ
  • पद 9अर्थ
    ये आठ श्लोक मन को कृष्ण-कुण्ड के तट पर रहने के लिए प्रेरित करते हैं। जो इनका पाठ करता है और अपने मन को श्री राधा-गिरिधारी के चरण-कमलों में डुबो देता है, उसे शीघ्र ही उनके प्रति सच्चा प्रेम प्राप्त हो।
3 पद भजन में

सनातन गोस्वामी · कृष्ण-लीला-स्तव

  • पद 1भजन
    आनीत-कंस-सन्त्रास
    प्रोषित-ज्णाति-बन्धव
    जय सम्मानिताषेष
    यादवावास-दायक
  • पद 2भजन
    सदा दया-स्मितालोक
    नन्दिताखिल-यादव
    जय रोग-जरा-ग्लानि
    हरि-सन्दर्षनामृत
इस भजन में 1 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    प्रसीद सात्वत-ष्रेष्ठ
    यादवेन्द्र प्रसीदमे
    वृष्णि-पुण्गव मां पाहि
    दाषार्हाधीप माधव
3 पद भजन में

सनातन गोस्वामी · कृष्ण-लीला-स्तव

  • पद 1भजन
    आनीत-कंस-सन्त्रास-प्रोषित-ज्ञाति-बान्धव
    जय सम्मानिताशेष-यादवावास-दायक
  • पद 2भजन
    सदा दया-स्मितालोकानन्दिताखिल-यादव
    जय रोग-जरा-ग्लानि-हारि-सन्दर्शनामृत
इस भजन में 1 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    प्रसीद सात्वत-श्रेष्ठ यादवेन्द्र प्रसीद मे
    वृष्णि-पुङ्गव मां पाहि दाशार्हाधिप माधव
3 पद भजन में

रूप गोस्वामी

  • पद 4भजन
    कुण्डल-स्फुरद्-अंसाय वंशायत्त-मुख-श्रिये
    राधा-मानस-हंसाय व्रजोत्तंसाय ते नमः
  • पद 10भजन
    बर्हेन्द्रायुध-रम्याय जगज्-जीवन-दायिने
    राधा-विद्युद्-वृताङ्गाय कृष्णाम्भोदाय ते नमः
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  • पद 14भजन
    आधारो’प्य् अपराधानाम् अविवेक-हतो’प्य् अहम्
    त्वत्-कारुण्य-प्रतीक्षो’स्मि प्रसीद मयि माधव
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 3

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    …ता'के जेता कठिन संसारे
    कृष्ण बरो दोयामोय्, कोरिबारे जिह्वा जय्,
    स्व-प्रसाद्-अन्न दिलो भाइ
    सेइ अन्नामृत पाओ, राधा-कृष्ण-गुण गाओ, …
  • पद 1अर्थ
    …उन्होंने जिह्वा को जीतने के लिए ही अपना प्रसाद हमें दिया है। उस अमृतमय अन्न को ग्रहण करो, राधा-कृष्ण के गुणों का गान करो और प्रेमपूर्वक चैतन्य-निताई को पुकारो।…
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 3

वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    जयतां सुरतौ पङ्गोर् मम मन्द-मतेर् गती
    मत्-सर्वस्व-पदाम्भोजौ राधा-मदन-मोहनौ
  • पद 1अर्थ
    अत्यन्त कृपालु राधा और मदन-मोहन की जय हो! मैं लंगड़ा और मूढ़ बुद्धिवाला हूँ, फिर भी वे दोनों ही मेरे मार्गदर्शक हैं, और उनके चरण-कमल ही मेरा सब कुछ हैं।
2 पद भजन में 1 पद अर्थ में

स्तवामृत-लहरी

  • पद 7भजन
    यत्रैव गङ्गाम् अनु नावि राधाम्
    आरोह्य मध्ये तु निमग्न-नौकः
    कृष्णो हि राधानुगलो बभौ स
    गोवर्धनो मे दिशताम् अभीष्टम्
  • पद 9भजन
    एतत् पठेद् यो हरि-दास-वर्य-
    महानुभावाष्टकम् आर्द्र-चेताः
    श्री-राधिका-माधवयोः पदाब्ज-
    दास्यं स विन्देद् अचिरेण साक्षात्
  • पद 9अर्थ
    ये आठ श्लोक हरि के इस सबसे श्रेष्ठ सेवक की महिमा गाते हैं। जो पाठक शुद्ध प्रेम से पिघले हृदय से इनका पाठ करता है, उसे शीघ्र ही श्री राधा-माधव के चरण-कमलों की साक्षात सेवा प्राप्त हो।
2 पद भजन में 4 पद अर्थ में 5

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 15भजन
    जशोमती-आज्ञा पे'ये धनिष्ठा-आनीतो
    श्री-कृष्ण-प्रसाद राधा भुञ्जे हो'ये प्रीतो
  • पद 16भजन
    ललितादि सखी-गण अवशेष पाय
    मने मने सुखे राधा-कृष्ण-गुण गाय
  • पद 8अर्थ
    श्रीमती राधारानी के बनाये हुए अन्न, तरकारी, मिष्ठान्न और पिष्टक को कृष्ण परम आनन्द के साथ खाते हैं।
  • पद 10अर्थ
    अपनी आँखों के कोर से राधारानी और उनकी सखियों को निहारते हुए, कृष्ण माता यशोदा के घर में परम सन्तोष के साथ भोजन करते हैं।
इस भजन में 2 और मिलान दिखाएँ
  • पद 15अर्थ
    माता यशोदा के आदेश से सखी धनिष्ठा कृष्ण की थाली के शेष प्रसाद को श्रीमती राधारानी के पास ले जाती हैं, और राधारानी उन्हें बड़ी प्रसन्नता से ग्रहण करती हैं।
  • पद 16अर्थ
    फिर ललिता आदि सखियाँ उस प्रसाद के शेष भाग को ग्रहण करती हैं, और अपने हृदय में बड़े आनन्द से राधा-कृष्ण के गुणों का गान करती हैं।
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 2

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 17भजन
    वद यादव माधव कृष्ण हरे
    वद राम जनार्दन केशव हे
    वृषभानु-सुता-प्रिय-नाथ सदा
    भज गोद्रुम-कानन-कुञ्ज-विधुम्
  • पद 17अर्थ
    हे मित्र, भगवान् के नाम पुकारो: "हे यादव! हे माधव! हे कृष्ण! हे हरि! हे राम! हे जनार्दन! हे केशव! हे वृषभानु-नन्दिनी राधा के प्रिय स्वामी!" निरन्तर उस चन्द्रमा-स्वरूप गौरांग की भक्ति करो, जो गोद्रुम वन की कुंजों में सुशोभित हैं।
1 पद भजन में 2 पद अर्थ में

नरोत्तम दास ठाकुर · प्रार्थना

  • पद 3भजन
    राधा-कृष्ण श्रि-चरण सेइ मोर प्राण-धन
    सेइ मोर जीवन-उपाय
    जय पतित-पावन देह मोरे एइ धन
    तूया-विने अन्य नाहि भाय
  • पद 1अर्थ
    हे हरि! हे हरि! ऐसा दिन मेरा कब होगा, जब मैं राधा-कृष्ण दोनों के चरण-कमलों का दर्शन करूँगा, उन्हें स्पर्श करूँगा, और दोनों की सेवा करूँगा?
  • पद 3अर्थ
    राधा-कृष्ण और वृन्दावन धाम ही मेरे जीवन की सच्ची निधि हैं, वही मेरे जीवन का आधार हैं। हे पतितपावन! मुझे यह निधि दो, तुम्हारे बिना और कोई मुझे नहीं सुहाता।
1 पद भजन में 2 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 8भजन
    के ना धाय से करुणा-आशे
    जय जय ध्वनि अबनी भरल भणे घनश्याम-दासे
  • पद 3अर्थ
    करताल अनेक प्रकार की तालों में बजते हैं। गोविन्द, माधव और वासु प्रभु की महिमा का गान करते हैं। चारों दिशाएं महिमा से भर जाती हैं।
  • पद 8अर्थ
    भगवान गौर की कृपा पाने के लिए कौन नहीं दौड़ेगा? सारा संसार जय! जय! की ध्वनि से भर जाता है। यह घनश्याम दास कहते हैं।