- पद 3भजन
हुङ्कृत तर्जन गर्जन रङ्गे
लोचन कलि-युग पाप स शङ्के
पद रज ताडित दुष्ट समस्ते
शुद्ध कनक जय गौर नमस्ते
- पद 4भजन
सिंह गमन जिति ताण्डव लीला
दीन दया-मय तारण शीला
अज भव पद-नख चन्द्रे
शुद्ध कनक जय गौर नमस्ते
- पद 5भजन
गौराङ्गावृत मालती माले
मेरु विलम्बित गङ्गा धारे
मन्द मधुर हास भाष मुख चन्द्रे
शुद्ध कनक जय गौर नमस्ते
- पद 6भजन
फल्गु विराजित चन्दन भाल
कुङ्कुम् राजित देह विशाल
उमापति सेवित पद नख चन्द्रे
शुद्ध कनक जय गौर नमस्ते
- पद 7भजन
भक्ति पराधीन शान्तक वेश
गमन सुनर्तक भोग विशेष
माला विराजित देह समस्ते
शुद्ध कनक जय गौर नमस्ते
- पद 8भजन
भोग विरक्तिक संन्यासी वेश
शिखा मोचन लोक प्रवेश
भक्ति विरक्तिक प्रवर्तक चित्त
शुद्ध कनक जय गौर नमस्ते
- पद 3अर्थ
जिनकी संकीर्तन के आनन्द में गरजती पुकारें और गड़गड़ाती फटकार कलियुग के पापों को उनकी दृष्टि मात्र से थरथरा देती हैं, जिनके चरणों की धूल सभी दुष्टों को गिरा देती है, हे शुद्ध स्वर्ण-वर्ण, हे गौर, तुम्हारी जय हो, तुम्हें प्रणाम!
- पद 4अर्थ
जिनकी सिंह-सी चाल शिव के तांडव-नृत्य को भी मात करती है, जिनका स्वभाव पतितों का दयापूर्वक उद्धार करना है, जिनके चरण-नख के चन्द्रमा के आगे ब्रह्मा और शिव भी झुक जाते हैं, हे शुद्ध स्वर्ण-वर्ण, हे गौर, तुम्हारी जय हो, तुम्हें प्रणाम!
- पद 5अर्थ
जिनके गौर अंग मालती के हारों से सुशोभित हैं, जिनसे मानो मेरु पर्वत से गंगा लटक रही हो, जिनके चन्द्रमुख पर मृदु, मधुर मुस्कान और वाणी विराजती है, हे शुद्ध स्वर्ण-वर्ण, हे गौर, तुम्हारी जय हो, तुम्हें प्रणाम!
- पद 6अर्थ
जिनका मस्तक चन्दन-तिलक से सुशोभित है, जिनकी विशाल देह कुमकुम से अनुलिप्त है, जिनके चरण-नख के चन्द्रमा की सेवा स्वयं उमापति शिव भी करते हैं, हे शुद्ध स्वर्ण-वर्ण, हे गौर, तुम्हारी जय हो, तुम्हें प्रणाम!
- पद 7अर्थ
जो सर्वथा भक्ति के अधीन हैं, जिनका स्वभाव शान्त और संयत है, जिनकी हर गति ही एक सुन्दर नृत्य है, जिनका सम्पूर्ण शरीर मालाओं से सुशोभित है, हे शुद्ध स्वर्ण-वर्ण, हे गौर, तुम्हारी जय हो, तुम्हें प्रणाम!
- पद 8अर्थ
…ने भक्ति और वैराग्य दोनों को ही मार्ग के रूप में स्थापित किया, हे शुद्ध स्वर्ण-वर्ण, हे गौर, तुम्हारी जय हो, तुम्हें प्रणाम!…