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“गौर आरती” के परिणाम

440 भजन · 571 पद भजन के शब्दों में · 470 पद अर्थ में

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8 पद भजन में 8 पद अर्थ में

सार्वभौम भट्टाचार्य

  • पद 1भजन
    मलय-सुवासित-भूषित-गात्रम्
    मूर्ति-मनोहर-विश्व-पवित्रम्
    पद-नख-राजित-लज्जित-चन्द्रे
    शुद्ध-कनक जय गौर नमस्ते
  • पद 2भजन
    स्व-गात्र पुलक लोचन पूर्णम्
    जीव दया-मय ताप-विदीर्णम्
    सङ्ख्या जल-पति नाम सहस्रे
    शुद्ध कनक जय गौर नमस्ते
  • पद 1अर्थ
    जिनके अंग चन्दन से सुवासित और अलंकृत हैं, जिनका मनोहर रूप सम्पूर्ण जगत को पवित्र करता है, जिनके चरण-नखों की कान्ति चन्द्रमा को भी लज्जित कर देती है, हे शुद्ध स्वर्ण-वर्ण, हे गौर, तुम्हारी जय हो, तुम्हें प्रणाम!
  • पद 2अर्थ
    जिनके अपने शरीर के रोम पुलकित हैं, जिनके नेत्र सदा अश्रुओं से भरे रहते हैं, जो जीवों पर दयालु हैं और उनके दुःख को मिटा देते हैं, जो सहस्रों नामों की गिनती करते हुए अश्रुओं का सागर बन जाते हैं, हे शुद्ध स्वर्ण-वर्ण, हे गौर, तुम्हारी जय हो, तुम्हें प्रणाम!
इस भजन में 12 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    हुङ्कृत तर्जन गर्जन रङ्गे
    लोचन कलि-युग पाप स शङ्के
    पद रज ताडित दुष्ट समस्ते
    शुद्ध कनक जय गौर नमस्ते
  • पद 4भजन
    सिंह गमन जिति ताण्डव लीला
    दीन दया-मय तारण शीला
    अज भव पद-नख चन्द्रे
    शुद्ध कनक जय गौर नमस्ते
  • पद 5भजन
    गौराङ्गावृत मालती माले
    मेरु विलम्बित गङ्गा धारे
    मन्द मधुर हास भाष मुख चन्द्रे
    शुद्ध कनक जय गौर नमस्ते
  • पद 6भजन
    फल्गु विराजित चन्दन भाल
    कुङ्कुम् राजित देह विशाल
    उमापति सेवित पद नख चन्द्रे
    शुद्ध कनक जय गौर नमस्ते
  • पद 7भजन
    भक्ति पराधीन शान्तक वेश
    गमन सुनर्तक भोग विशेष
    माला विराजित देह समस्ते
    शुद्ध कनक जय गौर नमस्ते
  • पद 8भजन
    भोग विरक्तिक संन्यासी वेश
    शिखा मोचन लोक प्रवेश
    भक्ति विरक्तिक प्रवर्तक चित्त
    शुद्ध कनक जय गौर नमस्ते
  • पद 3अर्थ
    जिनकी संकीर्तन के आनन्द में गरजती पुकारें और गड़गड़ाती फटकार कलियुग के पापों को उनकी दृष्टि मात्र से थरथरा देती हैं, जिनके चरणों की धूल सभी दुष्टों को गिरा देती है, हे शुद्ध स्वर्ण-वर्ण, हे गौर, तुम्हारी जय हो, तुम्हें प्रणाम!
  • पद 4अर्थ
    जिनकी सिंह-सी चाल शिव के तांडव-नृत्य को भी मात करती है, जिनका स्वभाव पतितों का दयापूर्वक उद्धार करना है, जिनके चरण-नख के चन्द्रमा के आगे ब्रह्मा और शिव भी झुक जाते हैं, हे शुद्ध स्वर्ण-वर्ण, हे गौर, तुम्हारी जय हो, तुम्हें प्रणाम!
  • पद 5अर्थ
    जिनके गौर अंग मालती के हारों से सुशोभित हैं, जिनसे मानो मेरु पर्वत से गंगा लटक रही हो, जिनके चन्द्रमुख पर मृदु, मधुर मुस्कान और वाणी विराजती है, हे शुद्ध स्वर्ण-वर्ण, हे गौर, तुम्हारी जय हो, तुम्हें प्रणाम!
  • पद 6अर्थ
    जिनका मस्तक चन्दन-तिलक से सुशोभित है, जिनकी विशाल देह कुमकुम से अनुलिप्त है, जिनके चरण-नख के चन्द्रमा की सेवा स्वयं उमापति शिव भी करते हैं, हे शुद्ध स्वर्ण-वर्ण, हे गौर, तुम्हारी जय हो, तुम्हें प्रणाम!
  • पद 7अर्थ
    जो सर्वथा भक्ति के अधीन हैं, जिनका स्वभाव शान्त और संयत है, जिनकी हर गति ही एक सुन्दर नृत्य है, जिनका सम्पूर्ण शरीर मालाओं से सुशोभित है, हे शुद्ध स्वर्ण-वर्ण, हे गौर, तुम्हारी जय हो, तुम्हें प्रणाम!
  • पद 8अर्थ
    …ने भक्ति और वैराग्य दोनों को ही मार्ग के रूप में स्थापित किया, हे शुद्ध स्वर्ण-वर्ण, हे गौर, तुम्हारी जय हो, तुम्हें प्रणाम!…
8 पद भजन में 6

सार्वभौम भट्टाचार्य · वैष्णव आचार्यों के और भजन

  • पद 1भजन
    नव गौर-वरं नव-पुष्प-शरं
    नव-भाव-धरं नव-लास्य-परम्
    नव-हास्य-करं नव-हेम-वरं
    प्रणमामि शची-सुत-गौर-वरम्
  • पद 2भजन
    नव-प्रेम-युतं नव-नीत-शुचं
    नव-वेश-कृतं नव-प्रेम-रसम्
    नवधा विलसत् शुभ-प्रेम-मयं
    प्रणमामि शची-सुत-गौर-वरम्
इस भजन में 6 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    हरि-भक्ति-परं हरि-नाम-धरं
    कर-जप्य-करं हरि-नाम-परम्
    नयने सततं प्रणयाश्रु-धरं
    प्रणमामि शची-सुत-गौर-वरम्
  • पद 4भजन
    सततं जनता-भव-ताप-हरं
    परमार्थ-परायण-लोक-गतिम्
    नव-लेह-करं जगत्-ताप-हरं
    प्रणमामि शची-सुत-गौर-वरम्
  • पद 5भजन
    निज-भक्ति-करं प्रिय-चारुतरं
    नट-नर्तन-नागर-राज-कुलम्
    कुल-कामिनि-मानस-लास्य-करं
    प्रणमामि शची-सुत-गौर-वरम्
  • पद 6भजन
    करताल-वलं कल-कण्ठ-रवं
    मृदु-वाद्य-सुवीणिकया मधुरम्
    निज-भक्ति-गुणावृत-नात्य-करं
    प्रणमामि शची-सुत-गौर-वरम्
  • पद 7भजन
    युग-धर्म-युतं पुनर् नन्द-सुतं
    धरणी-सुचित्रं भव-भावोचितम्
    तनु-ध्यान-चितं निज-वास-युतं
    प्रणमामि शची-सुत-गौर-वरम्
  • पद 8भजन
    अरुणं नयनं चरणं वसनं
    वदने स्खलितं स्वक-नाम-धरम्
    कुरुते सु-रसं जगतः जीवनं
    प्रणमामि शची-सुत-गौर-वरम्
4 पद भजन में 4 पद अर्थ में 9

नरोत्तम दास ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    गौराङ्गेर दुटि पद, जार् धन सम्पद,
    से जाने भकति-रस-सार्
    गौराङ्गेर मधुर-लीला, जार् कर्णे प्रवेशिला,
    हृदोय निर्मल भेलो तार्
  • पद 2भजन
    जे गौराङ्गेर नाम लोय्, तार होय् प्रेमोदोय्,
    तारे मुइ जाइ बोलिहारि
    गौराङ्ग-गुणेते झुरे, नित्य-लीला तारे स्फुरे,
    से जन भकति-अधिकारी
  • पद 1अर्थ
    गौरांग के दो चरण जिसका धन-सम्पत्ति हैं, वही भक्ति-रस का सार जानता है। गौरांग की मधुर लीला जिसके कानों में प्रवेश कर गई, उसका हृदय निर्मल हो जाता है।
  • पद 2अर्थ
    जो गौरांग का नाम लेता है, उसके हृदय में प्रेम का उदय होता है, मैं उस पर बलिहारी जाता हूँ। गौरांग के गुण सुनकर जो रो पड़ता है, उसके हृदय में राधा-कृष्ण की नित्य-लीला प्रकट हो जाती है, ऐसा व्यक्ति ही भक्ति का अधिकारी है।
इस भजन में 4 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    गौराङ्गेर सङ्गि-गणे, नित्य-सिद्ध कोरि' माने,
    से जाय् ब्रजेन्द्र-सुत-पाश्
    श्री-गौड-मण्डल-भूमि, जेबा जाने चिन्तामणि,
    तार होय् ब्रज-भूमे बास्
  • पद 4भजन
    गौर-प्रेम-रसार्णवे, से तरङ्गे जेबा डुबे,
    से राधा-माधव-अन्तरङ्ग
    गृहे बा वनेते थाके, 'हा गौराङ्ग' बो'ले डाके,
    नरोत्तम मागे तार सङ्ग
  • पद 3अर्थ
    जो गौरांग के सहचरों को नित्य-सिद्ध मानता है, वह व्रजेन्द्र-सुत के पास पहुँच जाता है। जो श्री गौड़-मण्डल भूमि को चिन्तामणि के समान जानता है, वह वास्तव में व्रज-भूमि में ही निवास करता है।
  • पद 4अर्थ
    गौर-प्रेम के रस-सागर की लहरों में जो डूब जाता है, वह राधा-माधव का अन्तरंग सेवक बन जाता है। वह घर में रहे या वन में, जो 'हा गौरांग!' कहकर पुकारता है, नरोत्तम उसी का संग माँगते हैं।
7 पद भजन में 4

नरहरि सरकार

  • पद 1भजन
    मन रे! कह ना गौर कथा
    गौरेर नाम, अमियार धाम, पिरीति मूरति दाता
  • पद 2भजन
    शयने गौर, स्वपने गौर, गौर नयनेर तारा
    जीवने गौर, मरणे गौर, गौर गलार हारा
इस भजन में 5 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    हियार माझारे, गौराङ्ग राखिया, विरले बसिया रब
    मनेर साधेते, से रूप-चादेरे, नयने नयने थोब
  • पद 4भजन
    गौर विहने, न वञ्छि पराणे, गौर क'रेछि सार
    गौर बलिय, जौक जीवने, किछु ना चाहिब आर
  • पद 5भजन
    गौर गमन, गौर गठन, गौर मुखेर हासि
    गौर-पिरीति, गौर मूरति, हीयाय रहल पशि
  • पद 6भजन
    गौर धरम, गौर करम, गौर वेदेर सार
    गौर चरणे, पराण सम्पिनु, गौर करिबेन पार
  • पद 7भजन
    गौर शबद, गौर सम्पद, जाहार हियाय जागे
    नरहरि दास, ताहार चरणे, सतत शरण मागे
8 पद भजन में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    जय जय गौर-हरि शचीर नन्दन
    श्री-चैतन्य बिश्वम्भर पतित-पाबन
  • पद 2भजन
    जय महाप्रभु गौरचन्द्र दयामय
    अधम-तारण नाथ बहक्त-आश्रय
इस भजन में 6 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    जीबेर जीबन गोर करुणा-सागर
    जगन्नाथ-मिश्र-सुत गौराङ्ग-सुन्दर
  • पद 4भजन
    प्रेममय प्रेम-दाता जगतेर गुरु
    श्री-गौर गोपालदेव बाञ्छा-कल्प-तरु
  • पद 20भजन
    . बिश्व-रूप बिश्व-नाथ बिश्व-बिमोहन
    श्री-गौर गोबिन्द भक्त-चित्त-सुरञ्जन
  • पद 28भजन
    गौराङ्ग मधुर नाम कर मन सार
    यांहा बिना कलि-युगे गति नाहि आर
  • पद 30भजन
    . गौर-नाम हरि-नाम एक-इ ये हय
    भागबत बाक्य ए-इ कभु मिथ्या नय
  • पद 32भजन
    गौर-नाम कृष्ण-नाम अति सु-मधुर
    सदा आस्वादये ये-इ से सब चतुर
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 1

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 1भजन
    भाले गौरा-गदाधरेर आरति नेहारि
    नदीया-पूरब-भाबे जाउ बोलिहारि
  • पद 1अर्थ
    श्रीश्री गौर-गदाधर की सुन्दर आरती को निहारते हुए, मैं नदिया में आने से पूर्व की उनकी उन लीलाओं में प्रवेश करता हूँ। मैं आश्चर्यचकित रह जाता हूँ।
3 पद भजन में 4 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर

  • पद 1भजन
    'हरि' बोले' मोदेर गौर एलो
  • पद 2भजन
    एलो रे गौराङ्ग-चान्द प्रेमे एलोथेलो
    निताइ-अद्वैत-सङ्गे गोद्रुमे पशिलो
  • पद 1अर्थ
    'हरि' पुकारते हुए हमारे गौर आ गए हैं!
  • पद 2अर्थ
    वे आ गए हैं, चन्द्र-सम गौरांग, प्रेम से छलकते और लड़खड़ाते हुए; निताई और अद्वैत के साथ वे गोद्रुम में प्रवेश कर गए हैं।
इस भजन में 3 और मिलान दिखाएँ
  • पद 5भजन
    नदीया भ्रमिते गोरा एलो नामेर हाटे
    गौर एलो हाटे, सङ्गे निताइ एलो हाटे
  • पद 5अर्थ
    नदिया में विचरण करते हुए गौर नाम के बाजार में आ पहुँचे हैं; गौर उस बाजार में आ गए हैं, और निताई भी उनके साथ वहाँ आ गए हैं।
  • पद 8अर्थ
    कितने आनन्द से जीव गौरचन्द्र के नृत्य में बहते चले जा रहे हैं! यह देखकर और सुनकर पाषण्डियों के हृदय ईर्ष्या से फट पड़ते हैं।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में 6

नरोत्तम दास ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के और भजन

  • पद 1भजन
    गौराङ्ग करुणा कोरो, दीन हीन जने
    मो-समो पतित प्रभु, नाहि त्रि-भुवने
  • पद 2भजन
    दन्ते तृण धोरि' गौर, डाकि हे तोमार्
    कृपा कोरि' एसो आमार्, हृदोय मन्दिरे
  • पद 1अर्थ
    हे गौरांग, इस दीन-हीन जन पर कृपा करें। हे प्रभु, मेरे समान पतित तीनों लोकों में कोई नहीं है।
  • पद 2अर्थ
    दाँतों में तिनका लेकर, हे गौर, मैं आपको पुकार रहा हूँ। कृपा करके मेरे हृदय-मन्दिर में आइए।
3 पद भजन में 3 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    आरे मोर गौर-किशोर
    सहचर कन्धे पहुं भुज-युग आरोपिया
    नबमी दशाय भेल भोर
  • पद 2भजन
    पडिया क्षितिर परे मुखे बाक्य नाहि सरे
    साहसे परशे नाहि केह
    सोणार गौर-हरि कहे हाय मरि मरि
    तन्तुक दोसर भेल देह
  • पद 1अर्थ
    आह! मेरे गौर-किशोर अपनी दोनों बाहें साथियों के कन्धों पर रखते हैं। वे मृत्यु के निकट प्रतीत होते हैं।
  • पद 2अर्थ
    वे भूमि पर गिर पड़ते हैं। उनके मुख से कोई शब्द नहीं निकलता। उन्हें छूने का साहस किसी में नहीं है। स्वर्णवर्ण गौर-हरि कहते हैं, "हाय! हाय! हाय!" उनके साथी उनके चारों ओर इकट्ठे हो जाते हैं।
इस भजन में 2 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    थिर नयन करि मथुरा नाम धरि
    रो-अये हा नाथ बलिया
    बसु रामानन्द बणे गौराङ्ग एमन केन
    ना बुझिनु किसेर लगिया
  • पद 3अर्थ
    उनकी दृष्टि स्थिर हो जाती है। वे पुकारते हैं, "मथुरा!" वे रोते हैं। वे पुकारते हैं, "हे मेरे प्रभु!" रामानन्द वासु कहते हैं, श्री गौरांग ऐसे क्यों हो गए हैं? मुझे नहीं पता।
3 पद भजन में 3 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    गौर पहुं ना भजिय मनु
    प्रेम-रतन धन हेलाय हारानु
  • पद 3भजन
    बिषम बिषय बिष सतत खा-इनु
    गौर-कीर्तन-रसे मगन ना हैनु
  • पद 1अर्थ
    मैंने गौर प्रभु का भजन नहीं किया। प्रेम के अमूल्य रत्न को मैंने असावधानी से फेंक दिया।
  • पद 3अर्थ
    मैं सदा इन्द्रिय-भोग के भयानक घातक विष का पान करता हूँ। मैं गौर प्रभु के कीर्तन के अमृत में नहीं डूबता।
इस भजन में 2 और मिलान दिखाएँ
  • पद 5भजन
    एमन गौराङ्गेर गुणे ना कान्दिल मन
    मनुष्य दुर्लभ जन्म हैल अकारण
  • पद 5अर्थ
    गौर प्रभु की महिमा सुनकर भी मेरा हृदय नहीं रोता। यह दुर्लभ मानव जन्म मेरे लिए व्यर्थ हो गया है।
3 पद भजन में 10

वासुदेव घोष · वैष्णव आचार्यों के और भजन

  • पद 1भजन
    यदि गौर ना होइतो, तबे कि होइतो,
    केमोने धरिताम् दे
    राधार् महिमा, प्रेम-रस-सीमा,
    जगते जानातो के
  • पद 3भजन
    गाओ गाओ पुनः, गौराङ्गेर् गुण,
    सरल कोरिया मन
    ए भव-सागरे, एमोन दोयाल्,
    ना देखिये एक-जन
इस भजन में 1 और मिलान दिखाएँ
  • पद 4भजन
    (आमि) गौराङ्ग बोलिया, ना गेनु गलिया,
    केमोने धोरिनु दे
    वासुर् हिया, पाषाण दिया,
    केमोने गडियाछे
2 पद भजन में 4 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    नाचे गौराङ्गचान्द बिभोर भाबेते
    से-इ भाबे गदाधर नाचये बामेते
  • पद 3भजन
    नाचे रे गौराङ्ग आमार हेलिया दुलिया
    बाजे खोल करताल ताधिया ताधिया
  • पद 1अर्थ
    भावविभोर होकर भगवान गौरांगचन्द्र नृत्य करते हैं। उसी भाव से भरकर गदाधर उनकी बायीं ओर नृत्य करते हैं।
  • पद 2अर्थ
    प्रेमभाव से अभिभूत होकर भगवान गौर का पग डगमगा जाता है। उनका सुवर्ण शरीर भूमि पर गिर जाता है। उनके पीछे भगवान निताईचन्द्र मुड़कर नृत्य करते हैं।
इस भजन में 2 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3अर्थ
    झूमते हुए मेरे भगवान गौरांग नृत्य करते हैं। खोल और करताल बज उठते हैं, ताधिया! ताधिया!
  • पद 4अर्थ
    भगवान् गौरांग भटके हुए पापियों को पकड़कर अपनी बाहों में भर लेते हैं। हाय! अधम नरहरि इन लीलाओं के अमृत में नहीं डूबा।
2 पद भजन में 3 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 1भजन
    एलो रे गौराङ्गचान्द प्रेमे एलोथेलो
    निताइ-अद्वैत-सङ्गे गोद्रुमे पशिलो
  • पद 4भजन
    नदीया भ्रमिते गोरा एलो नामेर हाटे
    गौर एलो हाटे सङ्गे निताइ एलो हाटे
  • पद 1अर्थ
    प्रेम से अभिभूत होकर, गौरांगचंद नित्यानन्द और अद्वैत के साथ गोद्रुम में प्रवेश कर गए।
  • पद 4अर्थ
    नदिया में विचरण करते हुए, गौरांग नाम की हाट में पहुँचे। जब गौरांग उस हाट में पहुँचे, तो नित्यानन्द भी उनके साथ उस हाट में पहुँचे।
इस भजन में 1 और मिलान दिखाएँ
  • पद 7अर्थ
    हर जीव आनन्द में क्यों तैरने लगा? गौरांगचाँद का नृत्य देखकर और सुनकर पाषण्डियों के भी हृदय प्रेम से फट गए।
2 पद भजन में 5

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    कबे गौर-बने, सुरधुनी-तटे,
    "हा राधे हा कृष्ण" बो'ले
    कान्दिया बेड़ाबो, देहो-सुख छाड़ि,
    नाना-लता तरु-तले
  • पद 4भजन
    (कबे) गौर-ब्रज-बने, भेद ना कोरिया,
    होइबो बरज-बासी
    (तखन) धामेर स्वरूप, स्फुरिबे नयने,
    होइबो राधार दासी
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 14

नरोत्तम दास ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    'गौराङ्ग' बोलिते हबे पुलक-शरीर
    'हरि हरि' बोलिते नयने ब' बे नीर
  • पद 1अर्थ
    'गौरांग' कहते ही जब मेरा शरीर रोमांचित हो उठेगा, वह शुभ क्षण कब आएगा? और 'हरि हरि' कहते हुए मेरे नेत्रों से अश्रु कब बहेंगे?
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 9

वासुदेव घोष · श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    गौराङ्ग तुमि मोरे दया ना छाडिह
    आपन करिया राङ्गा चरणे राखिह
  • पद 1अर्थ
    हे गौरांग प्रभु, मुझसे अपनी कृपा मत हटाइए। मुझे अपना बनाकर अपने लाल चरणों में रखिए।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 1भजन
    कबे आहा गौराङ्ग बोलिया
    भोजन-शयने देहेर जतन
    छारिबो बिरक्त हया
  • पद 4भजन
    काकुति कोरिया गौर-गदाधर
    श्री-राधा-माधब नाम
    कान्दिया कान्दिया डाकि उच्च रबे
    भ्रमिबो सकल धाम
  • पद 1अर्थ
    'गौरांग!' कहकर पुकारते हुए, कब मैं भोजन और शयन की देह-चिंता से विरक्त होकर उसे त्याग दूँगा?
  • पद 4अर्थ
    रुँधे गले से 'गौर-गदाधर!' और 'श्री राधा-माधव!' के नाम पुकारते हुए, रोते-रोते ऊँचे स्वर में कब मैं समस्त धाम में विचरण करूँगा?
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    नाचये गौराङ्ग पहुं सहचर सङ्ग
    श्याम-तनु गौर भेल बसन सुरङ्ग
  • पद 4भजन
    ह-इलेन दण्ड-धारी छाडिया बंशरी
    यदु कहे कृष्ण एबे ह-इल गौर-हरि
  • पद 1अर्थ
    गौरांग प्रभु अपने सहचरों के साथ नृत्य करते हैं। श्यामवर्ण कृष्ण अब गौरवर्ण गौर बन गए हैं और भव्य गेरुआ वस्त्र धारण किए हुए हैं।
  • पद 4अर्थ
    उन्होंने अपनी बांसुरी त्याग दी है, अब वे संन्यासी का दण्ड धारण करते हैं। यदु कहते हैं, भगवान कृष्ण अब गौर-हरि बन गए हैं।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    आरे आमार गौर-किशोर
    नाहि जाने दिबा निशि कारण बिहने हासि
    मनेर भरमे पहुं भोर
  • पद 4भजन
    कहे दास नरहरि आरे मोर गौर-हरि
    राधार पिरीते हैल हेन
    ऐछन करिय चिते कलि-युग उद्धारिते
    बञ्चित ह-इनु मुञि केन
  • पद 1अर्थ
    आह! मेरे गौर-किशोर को दिन-रात का ज्ञान नहीं रहता। बिना किसी कारण वे हँस उठते हैं। मेरे प्रभु का हृदय अभिभूत है।
  • पद 4अर्थ
    नरहरि दास कहते हैं, मेरे प्रभु गौर-हरि ने वही प्रेम अनुभव किया जो राधा अनुभव करती हैं। हृदय में यह प्रेम धारण करके उन्होंने कलियुग का उद्धार किया। फिर भी मुझ नरहरि का उद्धार क्यों नहीं हुआ? मुझे क्यों वंचित रखा गया?
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    सोणार बरण गौर सुन्दर
    पाण्डुर भैगेल देह
    शीत भीत केन काम्पये सघन
    सोँअरि पूरब लेह
  • पद 4भजन
    कहे नरहरि मोर गौर-हरि
    चाहये रङ्केर पारा
    हरि हरि बोले भुज-युग तोले
    मरम बुझिबे कारा
  • पद 1अर्थ
    श्री गौरसुन्दर का सुनहरा शरीर सफेद और फीका पड़ गया है। क्या ठण्ड से या डर से वे इतना काँप रहे हैं? वे अपने प्रिय के ध्यान में मग्न हैं।
  • पद 4अर्थ
    नरहरि कहते हैं, मेरे प्रभु गौर-हरि अभिभूत हैं। दोनों बाहें उठाकर वे "हरि! हरि!" का जाप करते हैं। उनके हृदय की बात कौन समझ सकता है?