श्रद्धा देबि नाम जार दुइति स्वभाब तार
श्रद्धा-देवी के दो स्वभाव हैं, एक विधि-मूल, दूसरा रुचि-मूल। जब शास्त्रों के अनुशासन का पालन करने से श्रद्धा का उदय होता है, तब वेद उसे वैधी श्रद्धा कहते हैं।
व्रजवासियों की शुद्ध सेवा को देखकर साधक के हृदय में श्रद्धा का उदय होता है। बड़े सौभाग्य से ही साधक को वह लोभमयी, दिव्य और शुद्ध रागानुगा श्रद्धा प्राप्त होती है।
श्रद्धा के भेद से भक्ति के भी भेद होते हैं, यही चारों वेद गाते हैं। वैधी और रागानुगा भक्ति के ये दो रूप हैं। साधन के समय जैसी भक्ति होती है, सिद्धि के समय भी वैसी ही प्राप्ति होती है। भक्ति-शास्त्र यही कहते हैं।
वैधी भक्ति धीरे चलती है, रागानुगा भक्ति बहुत तेज़ है, उससे बहुत जल्दी रस की अवस्था मिलती है। राग-मार्ग की साधना से हृदय में रुचि जागती है। रूपानुग भक्त इसी मार्ग पर दौड़ते हैं।