श्री गुरु बैष्णब कृपा कोत दिने हबे
गुरु और वैष्णवों की कृपा कितने दिनों बाद प्राप्त होगी? उपाधि-रहित प्रेम कब मेरे हृदय में जन्म लेगा?
मेरी सिद्ध-देह कब प्रकट होगी? कब कोई सखी मुझे युगल के विलास दिखाएगी?
उनके रूप को निहारते-निहारते मैं उन्मत्त हो जाऊँगा। जाति-कुल त्यागकर कदंब वन की ओर दौड़ पड़ूँगा।
पसीना, कंपन, रोमांच, अश्रु, विवर्णता, मूर्च्छा, स्तंभ और स्वर-भेद, ये सब भाव कब मुझमें उदय होंगे?
भाव से भरे वृन्दावन को अपनी आँखों से कब देखूँगा? किसी सखी की किंकरी बनकर युगल की सेवा कब करूँगा?
नरोत्तम दास से कब साक्षात होगा? कब उनकी 'प्रार्थना' का रस मेरे हृदय में प्रवेश करेगा?
चैतन्य के दास का यह दास अन्य सब आसक्तियाँ त्यागकर, हाथ जोड़कर, अब यह विनती करता है कि सदा श्री चैतन्य का ही चिंतन बना रहे।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- कल्याण-कल्पतरु
- भाव
- पद
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