श्री गुरु-चरण-स्मरणाष्टकम्
वे प्रतिदिन प्रातःकाल श्री तुलसी को प्रणाम करते हैं, अपने हाथों से तुलसी-चौरे को लीपते हैं और फिर तुलसी के सामने बैठकर अपने स्वामी-स्वामिनी के चरणों का स्मरण करते हैं। युगल की सेवा के लिए वे स्वयं ढेर सारे फूल चुनते हैं। भूमि पर गिरकर मैं अपने श्रेष्ठ गुरु श्री राधारमण की आनन्दपूर्वक वन्दना करता हूँ।
दोपहर में वे अपने प्रभु के चरणकमलों का ध्यान और पूजन करते हैं, भोग अर्पित करते हैं, परिक्रमा करते हैं, प्रणाम करते हैं और प्रेम से स्तुति गाते हैं। वे नृत्य करते हैं, सन्तों का संग करते हैं और सदा श्रीमद्भागवत के अर्थ के मधुर अमृत का आस्वादन करते हैं। भूमि पर गिरकर मैं अपने श्रेष्ठ गुरु श्री राधारमण की आनन्दपूर्वक वन्दना करता हूँ।
सन्ध्या के समय वे अपने दोनों चरण धोते हैं। उनका मन प्रणाम, स्तुति और जय-जयकार के लिए अत्यन्त उत्सुक रहता है, और वे वन से गोष्ठ लौटते अपने प्रभु के दर्शन करने जाते हैं। प्रेमानन्द की अधिकता से उनकी आँखों से देर तक अश्रुधारा बहती रहती है। भूमि पर गिरकर मैं अपने श्रेष्ठ गुरु श्री राधारमण की आनन्दपूर्वक वन्दना करता हूँ।
रात में वे श्री जयदेव के पद पढ़ते हैं, उनके गीत गाते हैं और भक्तों के साथ उनके रस का आस्वादन करते हैं। कभी-कभी वे भक्तों के बीच संकीर्तन में नाचते हैं। श्री राधा-कृष्ण की लीला-केलि के अनुभव में डूबे रहने से उन्हें नींद नहीं आती। भूमि पर गिरकर मैं अपने श्रेष्ठ गुरु श्री राधारमण की आनन्दपूर्वक वन्दना करता हूँ।
"निन्दा", इन दो अक्षरों से उनके कानों का कभी परिचय ही नहीं हुआ। वे प्रतिदिन अपनी जिह्वा से केवल साधुओं की प्रशंसा का स्वाद लेते हैं। उनके लिए सारा जगत विश्वास के योग्य है, और वे कहीं भी किसी का दोष नहीं देखते। भूमि पर गिरकर मैं अपने श्रेष्ठ गुरु श्री राधारमण की आनन्दपूर्वक वन्दना करता हूँ।
जो कोई भी उनके चरणकमलों में आ गिरता है, वे उसे अपना लेते हैं और अपनी कृपा के बल से शीघ्र ही उसे भक्ति का योग्य पात्र बना देते हैं। वे अपने सेवकों को प्रतिदिन भक्ति के रहस्यों की शिक्षा देते हैं। भूमि पर गिरकर मैं अपने श्रेष्ठ गुरु श्री राधारमण की आनन्दपूर्वक वन्दना करता हूँ।
जब कोई सेवक साष्टांग प्रणाम करता है, तो वे कृपा करके उसके सिर पर अपने चरण रख देते हैं। मधुर मुस्कान और कृपा-दृष्टि के अमृत से वे उसके मन को उल्लसित कर देते हैं, और उसमें प्रेम जगाने के लिए स्वयं उसे अपने चरणों की सेवा का उपदेश देते हैं। भूमि पर गिरकर मैं अपने श्रेष्ठ गुरु श्री राधारमण की आनन्दपूर्वक वन्दना करता हूँ।
वे लम्बे स्वर में "राधे! कृष्ण!" पुकारते हुए श्री युगल के नामामृत को निरन्तर अपनी जिह्वा के अग्रभाग पर नचाते रहते हैं। अहो! उन्हें किसी और वस्तु का भान ही नहीं रहता। सांसारिक व्यवहार का जो थोड़ा-बहुत काम करना पड़ता है, उसमें भी वे प्रेम में ही डूबे रहते हैं। भूमि पर गिरकर मैं अपने श्रेष्ठ गुरु श्री राधारमण की आनन्दपूर्वक वन्दना करता हूँ।
हे प्रभुवर, हे उमड़ती कृपा के सागर! आपके चरणकमलों के अमृत की ओर संकेत करने में यह अष्टक हर प्रकार से एक अणु जितना ही रह गया है। फिर भी मेरा मन-रूपी भ्रमर इसका सहारा लेकर शीघ्र आपका संग पाए और मंजु निकुंज-धाम में आपके स्वामी-स्वामिनी की सुगन्ध का आस्वादन करे।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- स्तवामृत-लहरी
- भाव
- पद
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