श्री कृष्ण बिरहे राधिकार दास
कृष्ण के विरह में राधिका की जो दशा होती है, उसे मैं सहन नहीं कर सकती। युगल के मिलन के सुख के लिए मैं अपना जीवन भी त्याग सकती हूँ।
राधिका के चरणों को क्षण भर के लिए भी छोड़ दूँ तो मुझ पर मानो प्रलय टूट पड़े। राधिका के लिए मैं सौ बार मरने को तैयार हूँ, वह दुःख मैं सहर्ष सह लूँगी।
राधा के इन दोनों चरणों की सेवा मुझे कब मिलेगी? हे व्रजवासियों, तुम मुझ पर कब दया करके मुझे व्रज के वन में ले चलोगे?
हे विलास-मञ्जरी! हे अनंग-मञ्जरी! हे श्री रूप-मञ्जरी! मुझे उठाकर अपने चरणों में रख लो और मुझे सिद्धि का सार प्रदान करो।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
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- पद
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