Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

श्री महाप्रभोरष्टकम्

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स्वरूप भवतो भवत्व् अयम् इति स्मित-स्निग्धया गिरैव रघुनाथम् उत्पुलक-गात्रम् उल्लासयन् रहस्य् उपदिशन् निज-प्रणय-गूढ-मुद्रां स्वयं विराजतु चिराय मे हृदि स गौरचन्द्रः प्रभुः
अर्थ

“स्वरूप दामोदर, यह रघुनाथ अब तुम्हारा हुआ।” स्नेह से भरी मधुर मुस्कान के साथ ये शब्द कहते हुए भगवान गौरचन्द्र ने रघुनाथ दास को ऐसा आनन्दित किया कि उनके रोम-रोम पुलकित हो उठे। उस गुप्त स्थान में प्रभु ने अपने गहन प्रेम का संकेत दिया। वह भगवान गौरचन्द्र सदा मेरे हृदय में विराजमान रहें।

स्वरूप मम हृद्-व्रणं बत विवेद रूपः कथं लिलेख यद् अयं पठ त्वम् अपि ताल-पत्रे ‘क्षरम् इति प्रणय-वेल्लितं विदधद् आशु रूपान्तरं विराजतु चिराय मे हृदि स गौरचन्द्रः प्रभुः
अर्थ

“स्वरूप दामोदर, रूप गोस्वामी ने मेरे हृदय का घाव कैसे जान लिया? देखो, उन्होंने इसी के बारे में इस ताड़पत्र पर यह श्लोक लिखा है, इसे पढ़ो।” ये बातें कहकर प्रभु ने रूप गोस्वामी के हृदय को प्रेम के आवेश से कँपा दिया। वह भगवान गौरचन्द्र सदा मेरे हृदय में विराजमान रहें।

स्वरूप परकीय-सत्-प्रवर-वस्तुनासेच्छतां दधज् जन इह त्वया परिचितो न वेतीक्षयन् सनातनम् उदित्य विस्मित-मुखं महा-विस्मितं विराजतु चिराय मे हृदि स गौरचन्द्रः प्रभुः
अर्थ

“स्वरूप दामोदर, इन जिज्ञासु भक्तों में से तुमने ऐसा कोई नहीं चुना जो सबसे श्रेष्ठ परकीया-रस को समझा सके।” फिर प्रभु ने एक दृष्टि से चकित सनातन गोस्वामी को चुन लिया। वह भगवान गौरचन्द्र सदा मेरे हृदय में विराजमान रहें।

स्वरूप हरि-नाम यज् जगद् अघोषयं तेन किं न वाचयितुम् अप्य् अथाशकम् इमं शिवानन्दजम् इति स्व-पद-लेहनैः शिशुम् अचीकरद् यः कविं विराजतु चिराय मे हृदि स गौरचन्द्रः प्रभुः
अर्थ

“स्वरूप दामोदर, मैंने तो सारे जगत को हरिनाम का कीर्तन करा दिया, फिर शिवानन्द सेन के इस पुत्र से मैं नाम क्यों नहीं बुलवा सकता?” यह कहते हुए प्रभु ने उस बालक को महान कवि बना दिया। वह भगवान गौरचन्द्र सदा मेरे हृदय में विराजमान रहें।

स्वरूप रस-रीतिर् अम्बुज-दृशां व्रजे भण्यतां घन-प्रणय-मान-जा श्रुति-युगं ममोत्कण्ठ्यते रमा यद् इह मानिनी तद् अपि लोकयेति ब्रुवन् विराजतु चिराय मे हृदि स गौरचन्द्रः प्रभुः
अर्थ

“स्वरूप दामोदर, व्रज में बहने वाली उस रस-धारा का वर्णन कमल-नयनी गोपियों से करवाओ। मेरे दोनों कान उस धारा के लिए तरस रहे हैं, जो सघन प्रेम से उत्पन्न मान से बहती है। देखो, यह रही वह ईर्ष्यालु लक्ष्मी!” ऐसा कहते हुए भगवान गौरचन्द्र सदा मेरे हृदय में विराजमान रहें।

स्वरूप रस-मन्दिरं भवसि मन्-मुदाम् आस्पदं त्वम् अत्र पुरुषोत्तमे व्रज-भुवीव मे वर्तसे इति स्व-परिरम्भणैः पुलकिनं व्यधात् तं च यो विराजतु चिराय मे हृदि स गौरचन्द्रः प्रभुः
अर्थ

“स्वरूप दामोदर, तुम रस के मन्दिर हो! तुम मेरे सुख के धाम हो! यहाँ जगन्नाथ पुरी में तुम ही मेरे लिए व्रज हो!” यह कहकर और उन्हें आलिंगन में लेकर प्रभु ने स्वरूप दामोदर को ऐसे आनन्द से भर दिया कि उनके रोम-रोम पुलकित हो उठे। वह भगवान गौरचन्द्र सदा मेरे हृदय में विराजमान रहें।

स्वरूप किम् अपीक्षितं क्व नु विभो निशि स्वप्नतः प्रभो कथय किं नु तं नव-युवा वराम्भोधरः व्यधात् किम् अयम् ईक्ष्यते किम् उ न हीत्य् अगात् तां दशां विराजतु चिराय मे हृदि स गौरचन्द्रः प्रभुः
अर्थ

“स्वरूप दामोदर, मैंने क्या देखा?” “कहाँ, हे प्रभु?” “रात में, स्वप्न में।” “प्रभु, कहिए तो, वह क्या था।” “वह एक युवक था, जो वर्षा का बादल था।” “उसने क्या किया? क्या आप अब भी उसे देख रहे हैं?” “वह मेरी आँखों से ओझल ही नहीं हुआ।” वह भगवान गौरचन्द्र सदा मेरे हृदय में विराजमान रहें।

स्वरूप मम नेत्रयोः पुरत एव कृष्णो हसन्न् अपैति न कर-ग्रहं बत ददाति हा किं सखे इति स्खलति धावति श्वसिति घूर्णते यः सदा विराजतु चिराय मे हृदि स गौरचन्द्रः प्रभुः
अर्थ

“स्वरूप दामोदर, मुस्कुराते हुए कृष्ण मेरी आँखों के सामने क्यों नहीं आते? हे सखे, वे मेरी ओर अपना हाथ क्यों नहीं बढ़ाते?” ऐसा कहते हुए वे बार-बार डगमगाते, दौड़ते, दीर्घ श्वास लेते और काँपते रहते हैं। वह भगवान गौरचन्द्र सदा मेरे हृदय में विराजमान रहें।

स्वरूप-चरितामृतं किल महाप्रभोर् अष्टकं रहस्यतमम् अद्भुतं पठति यः कृती प्रत्य्-अहं स्वरूप-परिवारतां नयति तं शची-नन्दनो घन-प्रणय-माधुरीं स्व-पदयोः समास्वादयन्
अर्थ

ये आठ श्लोक अद्भुत और परम गोपनीय हैं। इनमें श्री चैतन्य महाप्रभु की महिमा है और स्वरूप दामोदर गोस्वामी के साथ उनकी अमृत-लीलाएँ भरी हैं। जो संत भक्त इन्हें प्रतिदिन पढ़ता है, उसे चैतन्य महाप्रभु अपने चरणों के प्रति गहरे प्रेम की मधुरता चखाते हैं। वे उसे स्वरूप दामोदर का निजी पार्षद बना देते हैं।