श्री परम-गुरु-प्रभु-वराष्टकम्
जब शरणागत जनों का क्षेत्र संसार की आग में जलता है, तब उनके नेत्रों से बरसती अतुलनीय कृपा की वर्षा शीघ्र ही उस ताप को बुझा देती है और उसे निर्मल भक्ति के सरोवर के योग्य बना देती है। वे प्रभु श्री कृष्णचरण अपने चरणों का अमृत प्रदान करें।
उनके मुखकमल से निकली व्रजभूमि की महिमाओं की धारा को सुनकर मनुष्य पति-पत्नी, पुत्र और घर-बार छोड़ देता है और यमुना के तट पर वन की कुटिया में रहने चला जाता है। वे प्रभु श्री कृष्णचरण अपने चरणों का अमृत प्रदान करें।
व्रज की कमलनयनी गोपियों के भाव की पूर्णता साधक में कैसे आती है? उनका अनुगमन कैसे हो? इसकी साधना क्या है और इसका अधिकारी कौन है? उनके उपदेश का सौभाग्य पाए बिना इन बातों को कौन स्पष्ट रूप से समझ सकता है? वे प्रभु श्री कृष्णचरण अपने चरणों का अमृत प्रदान करें।
तपस्वियों, संन्यासियों, कर्मकाण्डियों और तार्किकों की सभा में, जहाँ हर कोई अपने-अपने मत का पाण्डित्य दिखाने के गर्व से भरा होता है, वे अपनी भक्ति के तेज से अन्धकार में सूर्य की तरह चमकते हैं। वे प्रभु श्री कृष्णचरण अपने चरणों का अमृत प्रदान करें।
"करोड़ों कामदेवों को लज्जित करने वाले श्री मदनमोहन आज श्री राधा के साथ क्या पहनेंगे? उन्हें क्या भोग लगाया जाए?" ऐसा सोचते हुए वे सदा आठों प्रहर अपने इष्टदेव की सेवा में बिताते हैं। वे प्रभु श्री कृष्णचरण अपने चरणों का अमृत प्रदान करें।
मृदंग और करताल के साथ मधुर कीर्तन में वे पुण्यवान लोगों को नचाते हैं और स्वयं भी नाचते हुए आनन्द के सागर में डूब जाते हैं। उनका शरीर पुलकित हो उठता है और वे अपने ही आँसुओं में नहा जाते हैं। वे प्रभु श्री कृष्णचरण अपने चरणों का अमृत प्रदान करें।
भगवान के भक्तों के साथ वे श्रेष्ठ भक्ति-शास्त्रों में वर्णित रस का बार-बार आस्वादन करते हैं और अपने परिजनों को भी उसका स्वाद चखाते हैं। सैकड़ों शिष्यों से घिरे हुए वे "चक्रवर्ती" नाम से विख्यात होकर शोभा पाते हैं। वे प्रभु श्री कृष्णचरण अपने चरणों का अमृत प्रदान करें।
वे गंगा के तट पर निवास करते हैं और श्री मदनमोहन ही उनके प्राण हैं। उन्हें रसिक भक्तों के संग की लालसा रहती है, लोगों के उद्धार में वे कुशल हैं, विषयी लोगों से वे विमुख रहते हैं और अपने अनुगामियों को तुरन्त क्षमा कर देते हैं। वे प्रभु श्री कृष्णचरण अपने चरणों का अमृत प्रदान करें।
उनका जो अनुगत जन उनके चरणकमलों में मन लगाकर प्रभुवर के इस अष्टक का पाठ करता है, वह निश्चय ही आनन्दपूर्वक प्रेम प्राप्त करता है। युगल की लीला का पोषण करने वाली मंजुल सखियों की विशेष कृपा का पात्र बनकर वह शीघ्र ही निकुंज-भवन के उन दोनों स्वामियों की सेवा करता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- स्तवामृत-लहरी
- भाव
- पद
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