श्रील नरोत्तम प्रभोरष्टक
मैं श्रील नरोत्तम दास ठाकुर को सादर प्रणाम करता हूँ, जो गौरांगदेव के सच्चे अनुगामी हैं। उनका मुखचन्द्र कृष्ण-नाम के अमृत की वर्षा करता है, और उसकी कान्ति अज्ञान के अन्धकार को मिटा देती है।
मैं श्रील नरोत्तम दास ठाकुर को सादर प्रणाम करता हूँ। कीर्तन के आनन्द में वे पसीने और आँसुओं की धाराओं से नहा जाते थे, और उनकी मन्द मुस्कान और दाँतों की चमक सब दिशाओं को उजाला कर देती थी।
मैं श्रील नरोत्तम दास ठाकुर को सादर प्रणाम करता हूँ। मृदंग और नाम की ध्वनि सुनते ही उनके दोनों मनोहर चरण-कमल थिरकने लगते थे, और तुरन्त उनका रोम-रोम पुलकित हो उठता था।
मैं श्रील नरोत्तम दास ठाकुर को सादर प्रणाम करता हूँ। उनके नृत्य ने गन्धर्वों के अभिमान को चूर कर दिया। उनकी भक्ति-क्रियाओं ने सबको विस्मित कर दिया, और उनके रचित गीतों ने उन्हें विख्यात कर दिया।
मैं श्रील नरोत्तम दास ठाकुर को सादर प्रणाम करता हूँ। वे कभी-कभी आनन्द में मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ते थे, और उनका शरीर धूल से ढक जाता था। केवल भाग्यशाली जन ही उन्हें उस अवस्था में देख पाते थे।
मैं श्रील नरोत्तम दास ठाकुर को सादर प्रणाम करता हूँ। स्थान-स्थान पर उनकी कृपा के तेज ने लोगों की कृष्ण से भिन्न किसी भी वस्तु की तृष्णा को समूल नष्ट कर दिया।
मैं श्रील नरोत्तम दास ठाकुर को सादर प्रणाम करता हूँ। कृष्ण-भक्ति में उनकी निष्ठा पत्थर पर खिंची लकीर जैसी अमिट है। उनका स्पर्श पारस-मणि जैसा है, और उनके वचन वेदों की तरह प्रमाण हैं।
मैं श्रील नरोत्तम दास ठाकुर को सादर प्रणाम करता हूँ। भक्तजन सदा यह सोचकर विस्मित होते हैं: क्या वे भक्ति के साक्षात् स्वरूप हैं? क्या वे वैराग्य का सार हैं, जो इस रूप में मनुष्य-लोक में अवतरित हुए हैं?
श्री नरोत्तम के चरण-कमलों का सुन्दर नृत्य, जो करताल और मृदंग की मधुर ध्वनि से मनोहर है, और गौरांग के गीतों का मधु पीकर और भी सुन्दर हो उठता है, वह मुझ सेवक की सारी आध्यात्मिक कामनाएँ पूरी करे।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- स्तवामृत-लहरी
- पद
- 9