Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

यदि ते हरि पाद सरोज सुधा

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यदि ते हरि-पाद-सरोज-सुधा रस-पान-परं हृदयं सततम् परिहृत्य गृहं कलि-भाव-मयं भज गोद्रुम-कानन-कुञ्ज-विधुम्
अर्थ

यदि तुम्हारा हृदय सदा भगवान हरि के चरण-कमलों की सेवा-सुधा पीने में तत्पर रहे, और यह घर कलियुग के भाव से भरा बंधन बन गया हो, तो हे मित्र, ऐसा घर त्याग दो और गोद्रुम वन की कुंजों में सुशोभित उस चन्द्रमा-स्वरूप गौरांग की भक्ति करो।

धन-यौवन-जीवन-राज्य-सुखं न हि नित्यम् अनुक्षण-नाश-परम् त्यज ग्राम्य-कथा-सकलं विफलं भज गोद्रुम-कानन-कुञ्ज-विधुम्
अर्थ

हे मित्र, विचार करो: धन, यौवन, जीवन और राजसुख नित्य नहीं हैं, ये हर क्षण नष्ट हो सकते हैं। इनकी आसक्ति छोड़ दो, और सांसारिक बातों की सारी व्यर्थ चर्चा त्याग दो। बस गोद्रुम वन की कुंजों में सुशोभित उस चन्द्रमा-स्वरूप गौरांग की भक्ति करो।

रमणी-जन-सङ्ग-शिखाम् च सखे चरमे भयदं पुरुषार्थ-हरम् हरि-नाम-सुधा-रस-मत्त-मतिर् भज गोद्रुम-कानन-कुञ्ज-विधुम्
अर्थ

हे मित्र, स्त्री-संगति का सुख अंत में जीवन के वास्तविक लक्ष्य को छीन लेता है और अत्यंत भयावह स्थिति में डाल देता है। ऐसे सुख को त्यागकर भगवान हरि के नाम की सुधा में मन को मत्त कर दो, और गोद्रुम वन की कुंजों में सुशोभित उस चन्द्रमा-स्वरूप गौरांग की भक्ति करो।

जड-कव्य-रसो न हि कव्य-रसः कलि-पावन-गौर-रसो हि रसः अलम् अन्य-कथाद्य् अनुशीलनया भज गोद्रुम-कानन-कुञ्ज-विधुम्
अर्थ

भौतिक और नीरस विषयों का काव्य-रस वास्तव में कोई रस नहीं है; असली रस तो कलियुग के पावन गौरांग की महिमा में है। इन नीरस सांसारिक काव्यों के अभ्यास से क्या लाभ? इन्हें त्यागकर गोद्रुम वन की कुंजों में सुशोभित उस चन्द्रमा-स्वरूप गौरांग की भक्ति करो।

वृषभानु-सुतान्वित-वाम-तनुं यमुना-तट-नागर-नन्द-सुतम् मुरली-कल-गीत-विनोद-परं भज गोद्रुम-कानन-कुञ्ज-विधुम्
अर्थ

गौरांग वही परम पुरुष हैं जो नन्द महाराज के पुत्र के रूप में प्रकट हुए थे। वे मुरली को मधुर स्वर में बजाते थे। अपने वाम भाग में श्रीमती राधारानी को लिए वे यमुना के तट पर सुंदर लीलाएँ करते थे। हे मित्र, उस परम पुरुष की भक्ति करो, जो गोद्रुम वन की कुंजों में सुशोभित चन्द्रमा-स्वरूप हैं।

हरि-कीर्तन-मध्य-गतं स्व-जनैः परिवेष्टित-जाम्बुनदाभ-हरिम् निज-गौड-जनैक-कृपा-जलधिं भज गोद्रुम-कानन-कुञ्ज-विधुम्
अर्थ

अपने भक्तों से घिरे हुए, गौरांग ने भगवान हरि के नाम का कीर्तन किया और बंगाल के निवासियों के लिए प्रेम बाँटने वाले करुणा के अनन्य सागर बन गए। उस चन्द्रमा-स्वरूप गौरांग की भक्ति करो, जो गोद्रुम वन की कुंजों में सुशोभित हैं।

गिरिराज-सुता-परिवीत-गृहं नव-खण्ड-पतिं यति-चित्त-हरम् सुर-सङ्घ-नुतं प्रियया सहितं भज गोद्रुम-कानन-कुञ्ज-विधुम्
अर्थ

गौरांग संन्यासियों के मन को मोहित करने वाले हैं, और वे नवद्वीप के स्वामी हैं, जो उनका अपना धाम है और गंगा नदी से घिरा है। वे वहाँ अपनी प्रिया श्रीमती विष्णुप्रिया देवी के साथ रहते हैं, और देवता तथा भक्त उनकी पूजा और स्तुति करते हैं। उस चन्द्रमा-स्वरूप गौरांग की भक्ति करो, जो गोद्रुम वन की कुंजों में सुशोभित हैं।

कलि-कुक्कुर-मुद्गर-भाव-धरं हरि-नाम-महौषध-दान-परम् पतितार्त-दयार्द्र-सु-मूर्ति-धरं भज गोद्रुम-कानन-कुञ्ज-विधुम्
अर्थ

सताए गए जीवों पर दया करके, भगवान ने गौरांग का सुंदर रूप धारण किया है। कलियुग रूपी कुत्ते को डंडे से भगाते हुए, गौरांग निरंतर भगवान हरि के नाम की महाऔषधि बांटते रहते हैं। उस चन्द्रमा-स्वरूप गौरांग की भक्ति करो, जो गोद्रुम वन की कुंजों में सुशोभित हैं।

रिपु-बान्धव-भेद-विहीन-दया यद् अभीक्ष्णम् उदेति मुखाब्ज-ततौ तम् अकृष्णम् इह व्रज-राज-सुतं भज गोद्रुम-कानन-कुञ्ज-विधुम्
अर्थ

भगवान श्री कृष्ण का मुखकमल सदा सभी जीवों पर दया प्रकट करता है, चाहे वे स्वयं को भगवान का मित्र समझें या शत्रु। इसी कारण व्रज के राजा (नन्द महाराज) के उस दयालु पुत्र ने अब स्वर्णिम वर्ण वाले गौरांग के रूप में अवतार लिया है। उस चन्द्रमा-स्वरूप गौरांग की भक्ति करो, जो गोद्रुम वन की कुंजों में सुशोभित हैं।

इह चोपनिषत्-परिगीत-विभुर् द्विज-राज-सुतः पुरटाभ-हरिः निज-धामनि खेलति बन्धु-युतो भज गोद्रुम-कानन-कुञ्ज-विधुम्
अर्थ

गौरांग की महिमा समस्त उपनिषदों द्वारा गाई गई है, और उनके शरीर की कांति ने सोने की चमक को भी मात दे दी है। वे द्विजराज (जगन्नाथ मिश्र) के पुत्र के रूप में प्रकट हुए हैं और अपने भक्तों के साथ अपने ही धाम नवद्वीप में लीलाएँ करते हैं। उस चन्द्रमा-स्वरूप गौरांग की भक्ति करो, जो गोद्रुम वन की कुंजों में सुशोभित हैं।

अवतार-वरं परिपूर्ण-कलं पर-तत्त्वम् इहात्म-विलास-मयम् व्रज-धाम-रसाम्बुधि-गुप्त-रसं भज गोद्रुम-कानन-कुञ्ज-विधुम्
अर्थ

गौरांग सभी अवतारों में सर्वश्रेष्ठ हैं, और उनमें भगवान् के सभी अवतार एक साथ विद्यमान हैं। वे स्वयं परम सत्य हैं और अपनी ही दिव्य लीलाओं में लगे रहते हैं। व्रजवासियों के बीच बहने वाले शुद्ध प्रेम के गुप्त रसों का जो सागर है, उसका वे निरन्तर स्वाद लेते हैं। उस चन्द्रमा-स्वरूप गौरांग की भक्ति करो, जो गोद्रुम वन की कुंजों में सुशोभित हैं।

श्रुति-वर्ण-धनादि न यस्य कृपा जनने बलवद्-भजनेन विना तम् अहैतुक-भाव-पथा हि सखे भज गोद्रुम-कानन-कुञ्ज-विधुम्
अर्थ

यदि किसी के पास सुदृढ़ भक्ति न हो, तो विद्वता, उच्च कुल में जन्म, धन या अन्य कोई भौतिक संपत्ति गौरांग की कृपा पाने में सहायक नहीं होती। इसलिए, हे मित्र, समस्त भौतिक स्वार्थों से मुक्त होकर पूर्ण भक्ति भाव से उस चन्द्रमा-स्वरूप गौरांग की भक्ति करो, जो गोद्रुम वन की कुंजों में सुशोभित हैं।

अपि नक्र-गतौ ह्रद-मध्य-गतं कम् अमोचयद् आर्त-जनं तम् अजम् अविचिन्त्य-बलं शिव-कल्प-तरुं भज गोद्रुम-कानन-कुञ्ज-विधुम्
अर्थ

गौरांग वही भगवान हैं जिन्होंने पहले गजेन्द्र हाथी को झील के मध्य में मगरमच्छ के आक्रमण से बचाया था, और जिन्होंने गजपति महाराज प्रतापरुद्र को भी संसार-रूपी भयंकर मगरमच्छ से बचाया। उस अचिन्त्य शक्ति से युक्त, कल्पवृक्ष-स्वरूप मंगलमय गौरांग की भक्ति करो, जो गोद्रुम वन की कुंजों में सुशोभित हैं।

सुरभीन्द्र-तपः-परितुष्ट-मना वर-वर्ण-धरो हरिर् आविरभूत् तम् अजस्र-सुखं मुनि-धैर्य-हरं भज गोद्रुम-कानन-कुञ्ज-विधुम्
अर्थ

सुरभीन्द्र की तपस्या से संतुष्ट हृदय होकर, भगवान हरि स्वर्णिम वर्ण वाले ब्राह्मण गौरांग के रूप में प्रकट हुए और निर्विशेषवादियों के सिद्धांतों का खंडन किया। उस नित्य दिव्य आनंद से पूर्ण, चन्द्रमा-स्वरूप गौरांग की भक्ति करो, जो गोद्रुम वन की कुंजों में सुशोभित हैं।

अभिलाष-चयं तद्-अभेद-धियम् अशुभं च शुभं त्यज सर्वम् इदम् अनुकूलतया प्रिय-सेवनाया भज गोद्रुम-कानन-कुञ्ज-विधुम्
अर्थ

हे मित्र, समस्त भौतिक इच्छाओं को त्याग दो, और मायावादियों की उस धारणा को भी त्याग दो कि जीव भगवान से अभिन्न है। जो भी शुभ और अशुभ भौतिक कर्म हैं, उन सभी को छोड़कर, गौरांग की शुद्ध और अनुकूल प्रेम-सेवा में लग जाओ। उस चन्द्रमा-स्वरूप गौरांग की भक्ति करो, जो गोद्रुम वन की कुंजों में सुशोभित हैं।

हरि-सेवक-सेवन-धर्म-परो हरि-नाम-रसामृत-पान-रतः नति-धैन्य-दया-पर-मान-युतो भज गोद्रुम-कानन-कुञ्ज-विधुम्
अर्थ

हे मित्र, विनम्र, दीन, पतित जीवों पर करुणाशील और सबका सम्मान करने वाले बनो। भगवान हरि के भक्तों की सेवा करो और सदा हरि-नाम की सुधा का पान करते रहो। इस प्रकार उस चन्द्रमा-स्वरूप गौरांग की भक्ति करो, जो गोद्रुम वन की कुंजों में सुशोभित हैं।

वद यादव माधव कृष्ण हरे वद राम जनार्दन केशव हे वृषभानु-सुता-प्रिय-नाथ सदा भज गोद्रुम-कानन-कुञ्ज-विधुम्
अर्थ

हे मित्र, भगवान् के नाम पुकारो: "हे यादव! हे माधव! हे कृष्ण! हे हरि! हे राम! हे जनार्दन! हे केशव! हे वृषभानु-नन्दिनी राधा के प्रिय स्वामी!" निरन्तर उस चन्द्रमा-स्वरूप गौरांग की भक्ति करो, जो गोद्रुम वन की कुंजों में सुशोभित हैं।

वद यामुन-तीर-वनाद्रि-पते वद गोकुल-कानन-पुञ्ज-रवे वद रास-रसायण गौर-हरे भज गोद्रुम-कानन-कुञ्ज-विधुम्
अर्थ

पुकारो: "हे कृष्ण, हे गोवर्धन पर्वत, वृन्दावन और यमुना-तट के स्वामी! हे गोकुल के वनों में सूर्य के समान चमकने वाले प्रभु! हे रासलीला का रस लेने वाले प्रभु! हे गौरांग, हे गौरवर्ण भगवान् हरि!" इस प्रकार उस चन्द्रमा-स्वरूप गौरांग की भक्ति करो, जो गोद्रुम वन की कुंजों में सुशोभित हैं।

चल गौर-वनम् नव-खण्ड-मयं पठ गौर-हरेश् चरितानि मुदा लुठ गौर-पदाङ्कित-गाङ्ग-तटं भज गोद्रुम-कानन-कुञ्ज-विधुम्
अर्थ

गौरांग के उस वन में जाओ, जो नवद्वीप के नौ खंडों से युक्त है; प्रसन्नता से गौरांग की लीलाओं का पाठ करो, और गंगा के उस तट पर लोटो, जो गौरांग के चरणों के चिन्हों से अंकित है। इस प्रकार उस चन्द्रमा-स्वरूप गौरांग की भक्ति करो, जो गोद्रुम वन की कुंजों में सुशोभित हैं।

स्मर गौर-गदाधर-केलि-कलं भव गौर-गदाधर-पक्ष-चरः शृणु गौर-गदाधर-चारु-कथां भज गोद्रुम-कानन-कुञ्ज-विधुम्
अर्थ

गौर-गदाधर की लीलाओं का स्मरण करो, गौर-गदाधर के अनुयायी बनो, और गौर-गदाधर की सुंदर कथाओं को सुनो। उस चन्द्रमा-स्वरूप गौरांग की भक्ति करो, जो गोद्रुम वन की कुंजों में सुशोभित हैं।

ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन डिज़ायर ट्री। सभी भक्त गायकों की जय।