अभीष्ट प्रार्थनाष्टक
कब ऐसा होगा कि गोष्ठ में मैं भी विशाखा की प्रिय सखी को पान अर्पित करूँगी? वे रोहिणी की ओट में सिर झुकाए छिपी बैठी हैं, और गोपराज के घर की स्वामिनी यशोदा माता आँसू भरी आँखों से अपने चंचल पुत्र को दुलारती हुई बार-बार उनकी ओर देख रही हैं।
कब ऐसा होगा कि जब गान्धर्वा राधा अपने ही घर में अपनी समवयस्क सखियों की टोलियों के साथ बड़े आनन्द से हरि के लिए शुद्ध भाव से हार बना रही होंगी, तब यह दासी पिटारियों के ढेर में से बार-बार रत्न चुनकर उनके सुन्दर हाथ में रखती हुई, आह, अपनी लता-सी भुजा को सफल करेगी?
कब ऐसा होगा कि लीला के राज्य में, व्रज के उस विजयी वन में, मेरी स्वामिनी राधा कृष्ण की प्रिया होने से अपना सौभाग्य वहाँ साक्षात् प्रकट करती हुई, चारों ओर क्रीड़ा करती हुई और कोयलों, भौंरों आदि अपनी प्रजा से सब ओर सेवित होकर मुझे आनन्दित करेंगी?
कब ऐसा होगा कि यमुना के तट पर सूर्य-सखा की पुत्री राधा तीन-चार सखियों के साथ लज्जा से मुख झुकाए फूल गूँथ रही होंगी, अहो, और बकासुर के शत्रु कृष्ण चुपके से आकर सहसा उनका आलिंगन करना चाहेंगे? तब राधा भौंहें तानकर उन्हें रोकेंगी, और मैं पंखा झलती हुई उनके उस भ्रूभंग का भरपूर रस लूँगी।
कब ऐसा होगा कि उस उज्ज्वल गोलाकार पुलिन पर रास-महोत्सव के उल्लास में, जब सोने-से अंगों वाली गोपियों के समूह 'पहले मैं, पहले मैं' की होड़ से मतवाले हो रहे होंगे और हरि उन्हें परखने के लिए नीलकमल-जैसी कसौटी बन गए होंगे, तब राधा अपने सबको जीतने वाले गुणों से दिव्य धन की भाँति हमें आनन्दित करेंगी?
कब ऐसा होगा कि भाण्डीर वृक्ष के नीचे प्रसिद्ध और मनोहर कुंज में, फूलों की अनुपम सेज पर बैठी अपनी प्रिया के अंग पर कृष्ण अद्भुत चित्र बनाएँगे? वे अपनी लता-सी भुजा उन पर टिकाए होंगे, विशाखा के हाथ से कूची लेंगे और उसके रंग लगाएँगे।
कब ऐसा होगा कि ऊँचे पर्वत-शिखर पर लताओं से ढके किसी एकान्त कुंज में राधा पहले उस वन-निवास की प्रशंसा करेंगी और अपने प्रियतम को पहले की लीलाएँ याद दिलाएँगी, फिर आनन्द के मद से अस्पष्ट और लज्जा से टूटे शब्दों में, जल्दी और उत्सुकता से मेरे सामने अपना प्रश्न रखेंगी?
जो मेरा नित्य लक्ष्य है, जो उनकी समवयस्क सखियों का सर्वस्व है, जो मेरी स्वामिनी के अपने प्रियतम के प्रति परम प्रेम से उपजे सौभाग्य की पूर्ण महिमा है, जो उन्हीं के समान हरि के प्रेम की शोभा है और जो उनका अपना निवास है, उस कुण्ड पर ललिता की प्रिय सखी राधा सदा मेरी आँखों के सामने शोभा पाती रहें।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- रघुनाथ दास गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- पद
- 8