आजु स्नेहेते बिह्वोल हैया
आज सबके हृदय आध्यात्मिक प्रेम से विह्वल हैं। अपने ब्राह्मण मित्रों के साथ वल्लभ आचार्य अधिवास का संस्कार करते हैं।
ऐसी पुत्री पाने के लिए लक्ष्मीप्रिया की माता ने कितने तप किए? सुन्दर वस्त्रों में सजी और तेजस्वी आभूषणों से अलंकृत लक्ष्मीप्रिया सुन्दर आँगन में एक भव्य सिंहासन पर बैठी हैं। उनकी सखियाँ आध्यात्मिक आनन्द में मग्न हैं।
शुभ क्षण में लक्ष्मीप्रिया को सुगन्धित फूलों की माला भेंट की जाती है। उनका हृदय आनन्दित है। उनके अंग तेजस्वी हैं। किसी का हृदय शान्त और स्थिर नहीं है। अनदेखी रहकर देवांगनाएँ चारों ओर खड़ी देख रही हैं।
शंख, घण्टा और अनेक प्रकार के वाद्य बज रहे हैं। सुन्दर नृत्य और गायन हो रहा है। भाट कवि मंगलमय कविताएँ सुनाते हैं। स्त्रियाँ उपहार देती हैं। किसी का मन शान्त नहीं है। नरहरि आदर से पूजन अर्पित करता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 4