निशि परभात समये ये रूप आनन्द शचीर घरे
भोर के समय शची के घर में बड़ा आनन्द भर जाता है। भगवान शेष अपने हजार मुखों से सैकड़ों-सैकड़ों युगों तक बोलते रहें, तब भी उसका थोड़ा-सा भी वर्णन नहीं कर सकते।
बालक गौरचन्द्र अपने साथियों को कितना आनन्द देते हैं? मैं समझता हूँ कि शची के आँगन में एक जाल बिछा हुआ है, ऐसा जाल जो सब लोकों को मोह लेता है।
बालक गौरचन्द्र अपना बिछौना छोड़कर दौड़ते-दौड़ते फिरते हैं। जो भी पास आता है, आनन्द से भर जाता है। वे सब गौरचन्द्र की मनोहर शोभा के सागर में मग्न हो जाते हैं। उनमें अपने घर लौट जाने की शक्ति नहीं रहती।
हर क्षण उनके हृदयों में अद्भुत प्रेम जन्म लेता है। वे अपना हृदय और शरीर बालक गौरचन्द्र के लाल-लाल चरणों में अर्पित कर देते हैं। ऐसा नरहरि कहते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 4