आजु नव श्याम विनोदिनी
आज राधा श्यामसुंदर कृष्ण के साथ नवीन चंचलता से सुशोभित हैं, उनके सम्पूर्ण अंग की सैकड़ों कामदेव सेवा कर रहे हैं; उनकी सुंदरता का वर्णन नहीं किया जा सकता।
शरद पूर्णिमा के चन्द्रमा को भी परास्त करते हुए उनका कमल-मुख खिल उठता है; उनके अधरों पर खिली मुस्कान मनोहर श्यामसुन्दर का चित्त चुरा लेती है।
उनके धारण किए बकुल-पुष्पों का मधु पी-पीकर भ्रमर-समूह उनके चारों ओर मँडराते हैं; उनके सभी आभूषण मृदु और मधुर झंकार करते हैं, और उनकी करधनी की घंटियाँ रुनझुन बजती हैं।
उनके चरण-कमलों में रत्नों के नूपुर खंजन पक्षी की बोली जैसी झंकार करते हैं। उनके पैरों के नाखून मानो कामदेव के ही दर्पण हों, ऐसे चमकते हैं। गोविन्द दास उन पर अपने को न्योछावर करते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास कविराज · जीवनी पढ़ें
- पद
- 4