आजु बिपिने याओत कान
आज कृष्ण वन को जा रहे हैं, उनका रूप मानो साक्षात् पुष्प-बाण कामदेव है; उनके श्याम अंग वर्षा के मेघ-से सुंदर हैं, उनकी हर भंगिमा किसी कुशल नर्तक के समान मनोहर है। उनका चन्द्र-मुख मृदु मुस्कान बिखेरता है, उनकी दृष्टि युवतियों के लिए मानो जाल बिछाती है; उनके बिम्बफल-सम लाल अधरों पर बाँसुरी बज रही है, जो तीनों लोकों को मोहित कर देती है।
उनके घने केशों में फूल गुँथे हैं, और चारों ओर भ्रमर गुंजार कर रहे हैं; उनका मुकुट मयूर-पंखों से सजा है, और मकर-आकार के कुण्डल हिल रहे हैं। उनके चंचल नेत्र खंजन पक्षी की जोड़ी के समान कानों की ओर बार-बार मुड़ते हैं; उनके गले में रत्नराज शोभा पाता है, और वक्षस्थल पर मोतियों की माला झूल रही है।
उनकी कमर पर घुँघरू वाला पीला वस्त्र बँधा है, और उनकी चाल गजराज के समान मस्त और भव्य है। कदम्ब के फूलों की माला घुटनों तक लटकी है, जिसके चारों ओर मतवाले भौंरे मँडराते हैं। उनके लाल चरण-कमल उगते सूर्य की किरणों को भी मात देते हैं। उनके सुन्दर नूपुरों की मधुर बोली गोविन्द दास के हृदय को आनन्दित करती है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास कविराज · जीवनी पढ़ें
- पद
- 3