भजहू रे मन
भजहू रे मन श्री-नन्द-नन्दन
गोविन्द दास कविराज इस संग्रह के 84 भजनों के रचयिता हैं, जो इन ग्रन्थों से लिए गए हैं: वैष्णव आचार्यों के भजन। 18 रिकॉर्डिंग सुनी जा सकती हैं।
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भजहू रे मन श्री-नन्द-नन्दन
कलि-युगे श्री-चैतन्य अबनी करिला धन्य
आँचरे मुख-शशि गोय
आजु नव श्याम विनोदिनी रा-इ
आजु बिपिने या-ओत कान
आध आध अङ्ग मिलल राधा कानु
आहा कि देखि गो बड़-इ कदम्बेर तले
उह पुरुख-बर बिदगध-शेखर
ऋतु-पति बिहरति नागर-श्याम
ए धनि आञ्चरे बदन झाम्पाँअ
ए धनि मोहे ना करु आरु छन्द
ए-इ त बृन्दाबन-पथे
ऐछन बचन कहल यब कान
काञ्चन-यूथी कुसुम ल-इ गोरी
कानने सबहुँ कुसुम परकाश
कानु-कथा शुनि गदगद भाष
कत कत ब्रज नब बाला
कि ये शुनि सुधामय मुरलीर रब
कुन्द-कुसुमे करु कबरकि भार
खेलत फागु बृन्दाबन-चन्द
गगनहि निमगन दिनमणि कान्ति
गहन बिरहक लागि
गिरिबर-कन्दरे सुन्दर श्याम
गुरु-जन-नयन बिधुन्तुद मन्द
गुरु दुरु बञ्च उजोरल चन्द
गो-रख जागाइ शिङ्ग-ध्वनि शुन-इते
गोठ बिजयी ब्रज-राज किशोर
चतुर-शिरोमणि कान
चम्पक दाम हेरि मुरछि रहु माधब
चिकन काला गलाय माला
अभिनब नीलजलद तनु ढल ढल
जय जय यदु-कुल-जलनिधि-चन्द्र
नन्द-नन्दनगोपीजन-बल्लभ
जय रे जय रे जय, ठाकुर नरोत्तम,
जोब कोरु खेलि आलि सैया बाला
ढल ढल काञ्चा अङ्गेर लाबणी
दुहुँ जन आ-ओल कुञ्जक माह
देख राधा-माधव मेलि
गौर बरण तनु सोहन मोहन
धनि धनि अपरूप रास-बिहार
नन्द-नन्दन चन्द्र-चन्दन
नव घन कानन सोहन कुञ्ज;
नन्द-नन्दन सङ्गे सोहन
नहि उठल दोंहे कुण्डक-तीर
नीलाचले बनकचल गोरा
पिरीति मूरति अधिदेब
पद-तले भकत कल्प-तरु सिञ्चित
प्राण-प्रिय दुख शुनि शशि-मुखी