आमार एमोन भाग्य कोत दिने ह'बे
मुझे ऐसा सौभाग्य कितने दिनों बाद मिलेगा, जब कोई वैष्णव मुझे अपना कहकर स्वीकार करेगा?
श्रीगुरु के चरणामृत रूपी मधु का सेवन करके, उन्मत्त होकर, वृन्दावन में कृष्ण के गुणों का गान कब करूँगा?
कब यह दीन व्यक्ति घृणा करके कर्मियों, ज्ञानियों, कृष्ण-द्वेषियों और बहिर्मुख जनों का त्याग करेगा?
कब कर्मी और स्मार्त पंडितजन यह निर्णय करेंगे कि मैं बड़ा अशांत और आचार-रहित व्यक्ति हूँ?
कब पंडिताभिमानी मायावादी ज्ञानी मुझे पागल कहकर मेरा साथ छोड़ देंगे?
कब साधु वैष्णवजन मुझे कुसंग से मुक्त देखकर कृपापूर्वक मुझे आलिंगन देंगे?
कब यह पापी, यह राख का ढेर, किसी वैष्णव की देह को छूकर आनंद से सात्त्विक भावों को पाएगा?