बल्लभ भबने गौर राय
भगवान् गौर राय वल्लभ आचार्य के घर पहुँचते हैं। अब वल्लभ आचार्य आनन्द से भर उठे हैं।
अब आनन्दित वल्लभ आचार्य मंगलमय विवाह-संस्कार सम्पन्न करते हैं।
सुख के अमृत से भरे हृदय वाले भगवान् विश्वम्भर बरामदे में विवाह-मण्डप के नीचे खड़े हैं।
उनके अंगों की सुन्दर भंगिमाएँ सबके प्राणों को चुरा लेती हैं। उनके रूप की कान्ति दसों दिशाओं को प्रकाश से भर देती है।
उनके चन्द्र-समान मुख का वर्णन किन उपमाओं से हो सकता है? उनकी मन्द मुस्कान अमृत का गर्व नष्ट कर देती है।
उनकी आँखें सुन्दर ढंग से देखती हैं। जो भी उन्हें देखता है, उनमें से कोई भी शान्त नहीं रह पाता।
उनके कानों के पास मकर के आकार के कुण्डल सजे हैं। उनके सुन्दर घुँघराले केशों को देखकर कौन अभिभूत नहीं हो जाता?
वे कंगन और बाजूबन्द से सुन्दर ढंग से सजे हैं। उन्हें देखकर कितने कामदेव लज्जित हो जाते हैं?
वर को आया देखकर कन्या की माता सात दासियों के साथ आती हैं।
भगवान् गौर की उस शोभा का वर्णन करने की शक्ति किसमें है? हाथ में सात दीपक लेकर कन्या की माता भगवान् गौर की सात बार परिक्रमा करती हैं।
वे वर के स्वागत की रीति पूरी करती हैं, और सब घर के भीतर जाते हैं।
भाग्यवान् वल्लभ आचार्य अब विवाह-संस्कार के लिए अपनी पुत्री को लाते हैं।
वल्लभ आचार्य अपनी पुत्री को भव्य सिंहासन पर बिठाते हैं। कन्या का शरीर तेजस्वी है।
उनका शरीर अत्यन्त कोमल और सुकुमार है। उनका मुस्कुराता मुख पूर्णिमा के चन्द्रमा को जीत लेता है।
उनके वस्त्र रंग-बिरंगे और अद्भुत हैं। अनेक रत्नों से जड़े उनके आभूषण जगमगा रहे हैं।
अनेक विधियाँ पूरी करके वल्लभ आचार्य अपनी सुन्दर पुत्री को शची के पुत्र को अर्पित करते हैं।
ब्राह्मण वेदों का पाठ करते हैं। कुल की सुन्दर कन्याएँ “उलु-लुलु!” की ध्वनि करती हैं।
अनेक प्रकार से वाद्य बजाए जाते हैं। नर्तक नाचते हैं। भाट कवि कविताएँ सुनाते हैं।
देवता अपने विमानों से फूल बरसाते हैं। अनदेखे रहकर वे आते हैं और “जय!” कहते हैं।
सारा संसार महान् सुख से भर गया। इस लीला के कितने ही विवरण नरहरि नहीं बताएगा, नहीं बता पाएगा क्योंकि उसका एक ही मुख है?
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 20