गौरचन्देर बिबाह देखिबारे
मन में अभिलाषाएँ भरे नदिया की न जाने कितनी नवयुवतियाँ भगवान् गौरचन्द्र का विवाह देखने दौड़ रही हैं? उनमें से कौन धैर्य रख सकती है?
उनका रूप अनुपम वस्त्रों और आभूषणों से सजा है। उनकी सुन्दर शोभा जगमगा रही है। जब वे युवतियाँ मधुर चाल से चलती हैं, तब उनकी कमर और पैरों की घण्टियाँ (किंकिणी और नूपुर) बज उठती हैं। वे गलियों को प्रकाश से भर देती हैं।
वे आपस में न जाने कितनी रसभरी बातें करती हैं? वे सुन्दर और चंचल हैं। उनकी नाक में बेसर नामक आभूषण इधर-उधर हिलते हैं। उनके कमल-मुख घूँघट से ढके हैं। उनकी हल्की-हल्की मुस्कान तेज से चमकती है। क्या वे सब कुछ भूल गईं, या नहीं?
वे युवतियाँ सुन्दर नेत्रों से चारों दिशाओं में देखती हैं, ऐसे नेत्रों से जो काले अंजन से सजे हैं, जो हृदय को आनन्द देते हैं, और जो चंचल, नटखट खंजन पक्षियों को भी जीत लेते हैं। नरहरि के प्राणों के स्वामी उन प्रभु को देखकर उनके हृदय आनन्द से उमड़ पड़ते हैं और वे तुरन्त वल्लभ आचार्य के घर में प्रवेश करती हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 4