भालिरे नाचेरे मोर शचीर दुलाल
वाह! मेरे गौर, शची के पुत्र, नाच रहे हैं! गंगा के तट पर दूसरे चंचल बालकों से मिलकर वे ताली बजाने और “हरिबोल!” बोलने के खेल खेलते हैं।
उनके सिर के बाल सुन्दर ढंग से घुँघराले हैं। उनके मुख से अमृत-वचन निकलते हैं। उनका रूप शुद्धतम स्वर्ण को हरा देता है। माता शची बड़े यत्न से उन्हें वस्त्र पहनाती हैं। वे उनकी आँखों को काले काजल से सजाती हैं।
उनकी कलाइयों और भुजाओं पर कंगन और बाजूबंद चमक रहे हैं। उनके गले पर मोतियों की माला सजी है। उनके हाथ और पैर लाल कमल के फूलों को हरा देते हैं। वासुदेव घोष कहते हैं: मैं मर जाऊँगा, मैं मर जाऊँगा। शची रानी को जैसा पुत्र मिला, वैसा पुत्र पाने के लिए मैं सागर में डूब मरूँगा।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- वासुदेव घोष · जीवनी पढ़ें
- राग
- बेलोयार राग, दशकोशी
- पद
- 3