देब रमणी बृन्द बिरचि बेश बिबिध भान्ति
देवांगनाओं के समूह अनेक प्रकार के सुन्दर वस्त्र और आभूषण धारण करते हैं। वे अनुपम सोने के समान चमकती हैं।
देवांगनाओं के अनगिनत झुंड उत्साह से आकाश के मार्गों पर घूम रहे हैं। उत्सुक नेत्रों से वे प्रभु गौर के विवाह-समारोह को निहारती हैं।
सनातन मिश्र के घर की शोभामय रीतियों में आकर उनके शरीर के रोंगटे आनन्द से खड़े हो जाते हैं। उनके मन में नई-नई अभिलाषाएँ भर जाती हैं। वे शान्त नहीं रह पातीं।
वे अनुपम प्रभु गौर और उनकी तेजोमयी प्रियतमा के रूप से अपनी आँखें भर लेती हैं। नरहरि कितनी बार प्रभु गौर का गुणगान करेगा? नरहरि ने अपने प्राण प्रभु गौर की आराधना में न्योछावर कर दिए हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 4